कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। मध्यप्रदेश में करीब 45 साल पुराने डकैत विरोधी कानून को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. गोविंद सिंह ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी है ,जिसमें सवाल है कि जब मध्यप्रदेश में कोई भी सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो आखिर आम मामलों में भी इस सख्त कानून का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?

दरअसल, मामला मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम,1981 से जुड़ा है। यह कानून उस दौर में बनाया गया था, जब चंबल समेत प्रदेश के कई इलाकों में डकैत गिरोहों का आतंक बड़ी चुनौती था। डॉ गोविंद सिंह ने अपने वकील और पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव शर्मा के जरिये हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।

याचिका में दिया गया ये तर्क

याचिका में तर्क दिया गया है कि जिन परिस्थितियों से निपटने के लिए यह कानून बनाया गया था, वे परिस्थितियां अब पहले जैसी नहीं हैं। इसके बावजूद इस कानून की धाराओं का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों में भी किया जा रहा है। डॉ गोविंद सिंह का दावा है कि मध्यप्रदेश में अब कोई भी सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, उनका आरोप है कि इसके बावजूद धारा 11 और 13 जैसी कड़ी धाराओं का इस्तेमाल किया जा रहा है। याचिका में इसे समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारो के खिलाफ बताते हुए कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।

पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग

इस कानून की सख्ती का अंदाजा इसके जमानत संबंधी प्रावधानों से लगाया जा सकता है। कानून में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है, जबकि नियमित जमानत के लिए भी अतिरिक्त शर्तें लागू होती हैं। इसके अलावा विशेष अदालत, कठोर सजा और अपराध से जुड़ी संपत्ति की कुर्की जप्ती जैसे प्रावधान भी इस कानून में शामिल हैं। याचिका में वर्ष 2020 के बाद इस कानून के तहत एक हजार से ज्यादा FIR दर्ज होने का दावा किया गया है। इसीलिए हाईकोर्ट से वर्ष 2017 से अब तक दर्ज मामलों का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग की गई है। साथ ही लंबित मामलों को समाप्त कर उन्हें सामान्य अदालतों में स्थानांतरित करने की मांग भी याचिका में की गई है।

इस पूरे मामले में सरकार के कई जवाब भी पहले सामने आए हैं।

  • 2017 में तत्कालीन गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कहा था कि सूचीबद्ध गिरोह सक्रिय नहीं हैं, लेकिन असूचीबद्ध और बाहरी गिरोहों का खतरा बना हुआ है।
  • 2022 में तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने भी सूचीबद्ध गिरोहों के सक्रिय नहीं होने की बात कही, लेकिन कानून हटाना उचित नहीं माना।
  • 2023 में सरकार की ओर से फिर कहा गया कि सूचीबद्ध गिरोह सक्रिय नहीं हैं, लेकिन असूचीबद्ध और दूसरे राज्यों के गिरोहों पर नियंत्रण के लिए यह कानून जरूरी है।

यानी सरकार के जवाबों में एक तरफ सूचीबद्ध डकैत गिरोहों के सक्रिय नहीं होने की बात सामने आती रही, तो दूसरी तरफ कानून को बनाए रखने के पीछे दूसरे गिरोहों का खतरा आधार बताया गया। इस कानून का दायरा भी काफी बड़ा है। सरकारी जवाब के मुताबिक, ग्वालियर-चंबल संभाग के छह जिले जिनमे ग्वालियर, मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी और श्योपुर पूरी तरह इसके दायरे में हैं। इसके अलावा रीवा, सतना और पन्ना के कुछ चिन्हित थाना क्षेत्रों में भी यह कानून प्रभावी है।

HC की सुनवाई के बाद तय होगी दिशा

अब हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका के जरिए मूल सवाल यही है कि डकैतों के आतंक के दौर में बनाया गया यह कानून आज भी उसी रूप में जरूरी है या नहीं? याचिका पर हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद तय होगा कि इस कानून की संवैधानिक वैधता और इसके तहत दर्ज मामलों को लेकर आगे क्या दिशा तय होती है। मामले की अगली सुनवाई 08 सितंबर को होगी।

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