पंचकूला। हरियाणा सरकार के बहुचर्चित सरकारी फंड घोटाले में गिरफ्तार आईएएस अधिकारी प्रदीप कुमार की दो दिन की रिमांड खत्म हो गई है। रिमांड अवधि पूरी होने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने उन्हें दोबारा अदालत में पेश किया है। प्रदीप कुमार हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व सदस्य सचिव रह चुके हैं। सीबीआई का दावा है कि प्रदीप कुमार ने निवेश के तय नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी पैसे को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में ट्रांसफर कराया, जिससे विभाग को 169 करोड़ 35 लाख रुपए का भारी नुकसान हुआ। पूछताछ के दौरान जांच एजेंसी ने आरोपी अधिकारी का सामना बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल सबूतों, आधिकारिक नोटशीट और व्हाट्सएप चैट से कराया है।

पूछताछ के दौरान सीने में उठा दर्द

रिमांड के दौरान पूछताछ के बीच आईएएस प्रदीप कुमार को अचानक घबराहट हुई और उन्होंने छाती में दर्द की शिकायत की। इसके तुरंत बाद सीबीआई टीम उन्हें अस्पताल लेकर गई, जहां उनकी ईसीजी और दूसरे जरूरी मेडिकल टेस्ट कराए गए। तबीयत स्थिर होने पर अधिकारी को उनके बेटे और वकील से मिलने की इजाजत दी गई। पूछताछ में आरोपी अधिकारी ने दावा किया कि इस पूरे मामले में उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। उन्होंने केवल अपने तत्कालीन चेयरमैन के आदेशों का पालन किया था।

पूर्व चेयरमैन विनीत गर्ग पर आ सकती है आंच

आरोपी अधिकारी के इस बयान के बाद अब मामले की आंच तत्कालीन चेयरमैन और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनीत गर्ग तक पहुंच सकती है। प्रदीप कुमार के खुलासे के बाद चर्चा है कि अब सीबीआई इस मामले में विनीत गर्ग को भी गिरफ्तार कर सकती है। सीबीआई के अनुसार प्रदीप कुमार 31 अगस्त 2022 से 10 दिसंबर 2025 तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव के पद पर तैनात थे। इसी कार्यकाल के दौरान विभाग के फिक्स्ड डिपॉजिट यानी बैंक में तय समय के लिए जमा किए जाने वाले फंड के निवेश से जुड़े फैसले लिए गए थे, जिनमें उनकी मुख्य भूमिका थी।

नियमों को ताक पर रख कर किया निवेश

जांच एजेंसी का आरोप है कि प्रदीप कुमार ने अलग-अलग बैंकों से मिलने वाले ब्याज दरों की तुलना खुद तैयार की थी और निवेश के प्रस्ताव आगे बढ़ाए थे। सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि आरोपी अधिकारी ने अपनी आधिकारिक फाइल यानी नोटशीट में निवेश की सीमा तय करने वाले सरकारी दिशा-निर्देशों का जिक्र तो किया था, लेकिन हकीकत में उन नियमों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने जानबूझकर तय सीमा से कहीं ज्यादा बड़ी सरकारी रकम को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में जमा करवा दिया, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगा।

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