हेमंत शर्मा, Indore. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर एक अहम और स्पष्ट संदेश दिया है। कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती महिला को गर्भपात की अनुमति देते हुए कहा कि यदि गर्भसमापन कानून में तय समयसीमा के भीतर है तो इसके लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं है। महिला अपने शरीर और मातृत्व से जुड़े फैसले लेने के लिए स्वयं सक्षम है।

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मामले की सुनवाई के दौरान महिला ने अदालत को बताया कि उसका अपने पति से वैवाहिक विवाद चल रहा है और दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। ऐसे में वह इस गर्भ को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। अदालत ने महिला की परिस्थितियों को गंभीरता से देखते हुए उसके संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि महिला की शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार हैं। इसलिए यह तय करने का अधिकार पूरी तरह महिला का है कि वह गर्भ जारी रखना चाहती है या नहीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद, अलगाव और मानसिक परिस्थितियां भी गर्भसमापन की अनुमति देने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती हैं, बशर्ते मामला कानून के दायरे में हो।

कोर्ट ने संबंधित डॉक्टरों और मेडिकल बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि गर्भसमापन की पूरी प्रक्रिया मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के प्रावधानों के अनुसार सुरक्षित और शीघ्र पूरी की जाए। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि महिला के शरीर पर अंतिम फैसला किसी और का नहीं बल्कि स्वयं महिला का होगा।

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वैवाहिक विवाद के बीच पहुंचा मामला कोर्ट

मामला इंदौर संभाग के एक दंपती से जुड़ा है जिनकी शादी करीब दो वर्ष पहले हुई थी। समय के साथ दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया और वे अलग रहने लगे। इसी दौरान महिला गर्भवती हो गई। महिला ने अदालत को बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में बच्चे का पालन-पोषण और भविष्य को लेकर वह गंभीर मानसिक दबाव में है, इसलिए गर्भसमापन की अनुमति दी जाए।

पति को नोटिस फिर भी नहीं हुआ हाजिर

महिला ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। अदालत ने पति को नोटिस भी जारी किया लेकिन सुनवाई के दौरान वह कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। वहीं राज्य सरकार की ओर से भी याचिका पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई।

अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत महिला को शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। यदि गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम की निर्धारित सीमा के भीतर है, तो महिला अपनी इच्छा के अनुसार गर्भसमापन का निर्णय ले सकती है। ऐसे मामलों में पति की अनुमति कानूनी शर्त नहीं है।

वैवाहिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं आधार

अदालत ने यह भी माना कि पति-पत्नी के बीच गंभीर विवाद, अलगाव या वैवाहिक संबंध टूटने जैसी परिस्थितियां गर्भसमापन की अनुमति देने के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं। यदि महिला नहीं चाहती कि वह ऐसी स्थिति में गर्भ जारी रखे, तो उसे इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

डॉक्टरों को दिए आवश्यक निर्देश

हाईकोर्ट ने संबंधित चिकित्सकों को निर्देश दिए कि कानून और स्वास्थ्य मंत्रालय की निर्धारित गाइडलाइन का पालन करते हुए सुरक्षित एवं संवेदनशील तरीके से गर्भसमापन की प्रक्रिया पूरी की जाए।

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फैसले का व्यापक महत्व कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय महिलाओं के प्रजनन अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता को मजबूत करने वाला है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि कानून की तय सीमा के भीतर गर्भपात का निर्णय महिला का व्यक्तिगत अधिकार है और इसके लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है।

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