Odisha Desk, भुवनेश्वर: आसमान से बरसती आफत ने ओडिशा के कई हिस्सों में जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने न केवल आम जनता की मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि धरातल पर विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल भी खोल कर रख दी है। एक तरफ जहां सरकार शिक्षा के बुनियादी ढांचे और कायाकल्प पर करोड़ों रुपये खर्च करने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। राज्य के विभिन्न जिलों से आई ये तस्वीरें प्रशासन के दावों का खुलेआम मजाक उड़ा रही हैं।

बलांगीर: 1956 से स्थापित स्कूल में घुटनों तक भरा पानी, बच्चों की पढ़ाई ठप

प्रशसासनिक उदासीनता का सबसे बड़ा उदाहरण बलांगीर जिले के पाटनगढ़ से सामने आया है। यहाँ साल 1956 से स्थापित बांकी बहाल प्राथमिक विद्यालय आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। पिछले दो दशकों से अधिक समय से यह स्कूल प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। हालात यह हैं कि थोड़ी सी बारिश होते ही पूरे स्कूल परिसर में घुटनों तक पानी भर जाता है।

जलजमाव के कारण मासूम बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो गई है, और वे मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) से भी वंचित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नए स्कूल भवन के लिए एक साल पहले भूमिपूजन तो किया गया था, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका। बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो वे राजमार्ग जाम कर बड़ा आंदोलन करेंगे।

बरगढ़: उफनते नाले के कारण थमने की कगार पर ‘शादी की शहनाई’

दूसरी तरफ, बरगढ़ जिले से बेहद परेशान करने वाली खबर आई है। बाघपड़ा गांव के रघु भुए की बेटी की कल शादी है। बरपाली से बारात आनी तय हुई है, लेकिन इस समय कन्यापक्ष के घर में खुशी के माहौल की जगह मातम सा सन्नाटा है।

दरअसल, गांव को जोड़ने वाला मुख्य पुल पिछले 3 सालों से टूटा पड़ा है, जिसे ठीक करने के लिए प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली।

गांव बना टापू: कल से हो रही लगातार बारिश के कारण पूरा गांव पानी से घिर चुका है। गांव के पास के नाले में छाती तक पानी बह रहा है। लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इस खतरनाक स्थिति में नाला पार कर रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा संकट यह है कि बारात गांव के अंदर कैसे आएगी और बेटी की विदाई कैसे होगी। दुल्हन के पिता और ग्रामीण इस विकट स्थिति को लेकर गहरे तनाव में हैं। अगर पानी कम नहीं हुआ या प्रशासन ने तुरंत कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की, तो शादी के टलने की पूरी आशंका है।

कागजों तक सीमित विकास के नारे, कब जागेगा प्रशासन?

ये दोनों घटनाएं साफ तौर पर साबित करती हैं कि जमीनी स्तर पर विकास के नारे सिर्फ सरकारी कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित हैं। कहीं शिक्षा की नींव हिल रही है, तो कहीं सामान्य आवागमन पूरी तरह ठप है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले राजनेताओं और गहरी नींद में सोए प्रशासन की नींद आखिर कब खुलेगी?

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