हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। इंदौर नगर निगम के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड के बाद प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए इंजीनियरों को माननीय हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा 15 जून को जारी किए गए ट्रांसफर आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट के इस फैसले को नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विभाग के लिए एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक झटका माना जा रहा है।

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इंजीनियर शैलेंद्र मिश्रा को मिली वर्तमान पद पर बने रहने की अनुमति

भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई मौतों के बाद सरकार ने सख्त कार्रवाई का दावा करते हुए नगर निगम के इंजीनियरों को प्रतिनियुक्ति पर अन्य विभागों में भेजने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता इंजीनियर शैलेंद्र मिश्रा ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। कोर्ट ने सुनवाई करते हुए ट्रांसफर पर स्टे दे दिया है और मिश्रा को वर्तमान पद पर ही बने रहने की अनुमति दी है।

सवालों के घेरे में इंदौर निगम प्रशासन: समय पर रिलीव क्यों नहीं किया?

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब सीधे तौर पर इंदौर नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। सवाल उठ रहे हैं कि जब नगरीय प्रशासन विभाग से 15 जून को ही ट्रांसफर के आदेश जारी हो चुके थे तो निगम प्रशासन ने इन इंजीनियरों को समय रहते कार्यमुक्त क्यों नहीं किया? क्या निगम के भीतर ही कुछ अधिकारी इन दागी इंजीनियरों को बचाने का प्रयास कर रहे थे जिससे उन्हें कोर्ट जाने का पर्याप्त समय मिल सके?

क्या इंदौर निगम में इंजीनियरों का ही चलता है दबदबा?

यह कोई पहली घटना नहीं है जब इंदौर में भोपाल के आदेश बेअसर साबित हुए हों। करीब एक साल पहले भी 10 इंजीनियरों के ट्रांसफर आदेश इसी तरह कानूनी दांवपेच और कोर्ट के चक्कर में अटक चुके हैं। ऐसे में अब शहर की जनता और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या इंदौर नगर निगम में इंजीनियरों का दबदबा इतना मजबूत है कि सरकार के कड़े फैसले भी इनके सामने बौने साबित हो जाते हैं?

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आपको बता दें कि भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण कई मासूमों की जान गई थी, जिसके बाद सरकार ने कड़ी कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे किए थे लेकिन हाईकोर्ट के इस स्टे के बाद सरकार के उन दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।

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