“A friend in need is a friend indeed.” सम्मान, धैर्य, विश्वास और लम्बे समय तक साथ बने रहने की साफ़ नीयत से निभाए जाते हैं रिश्ते. रिश्तों को स्वार्थ और मतलब की कसौटी पर तौलना आज सामान्य सी बात है. कुछ रिश्ते इस दौर में भी बहुत क़ीमती होते हैं जिसका आँकलन किसी तर्क, विचार या मतभेद से नहीं किया जा सकता. मित्रता, प्रेम और आत्मीय संबंधों में सबसे बड़ी पूँजी होती है विश्वास और भरोसा. श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक
“सुहृदां सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति.”
जिसका कि अर्थ है सभी प्राणियों और जीव मात्र के प्रति मैत्री, प्रेम और सद्भाव ही शांति का मार्ग है. कभी-कभी अपने बेहद करीबी व्यक्ति की किसी बात या विचार से हम बिल्कुल असहमत होते हैं, पूरा समाज उससे असहमत होता है मगर फिर भी हमें उसके साथ उसका सम्बल बन कर खडा रहना होता है क्योंकि रिश्तों को बचाने के लिए यही ज़रूरी है. अपनों के साथ हर हाल में खड़ा रहना समझौता नहीं, रिश्ते की परिपक्वता है. जिस व्यक्ति को हम वर्षों से जानते हैं जिनकी नीयत और भावनाओं से हम भली-भाँति परिचित भी होते हैं ऐसे किसी व्यक्ति के किसी एक विचार को उसके पूरे व्यक्तित्व का पैमाना नही बनाया जा सकता.
सम्बन्ध को बचाए रखने के लिए कभी-कभी हमें भावनात्मक रूप से शीर्षासन भी करना पड़ सकता है. अपने अहंकार को उलटा करके भी देखना पड़ता है कि कहीं सामने वाला अपनी जगह सही तो नही? आपका सच आपका है मगर दबाव पूर्वक इसे सामने वाले का सच बनाने की कोशिश ना करें. किसी पर अपनी मान्यताएँ थोपकर उसे बदलने का प्रयास न करें इससे रिश्तों में दूरी पैदा होती है. असहमति को यदि स्वस्थ संवाद का विषय ना भी बनाया जा सके फिर भी टकराना उसका निदान नही है. धैर्य रखें, समय कई बार वह सिखा जाता है जो तर्क नहीं सिखा पाते. अगर सामने वाला गलत होगा तो समय उसे समझा देगा और अगर सही होगा तो हम समझ जाएँगे. किसी भी मतभेद को रिश्तों की दीवार न बनने दें.
स्मरण रहे- विचार बदले जा सकते हैं लेकिन गहरे संबंध नहीं

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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