भक्ति और प्रेम के प्रतीक श्रीकृष्ण, जीवन जीने की कला सिखाने वाले ऐसे महागुरु भी हैं जिनका ज्ञान आज भी प्रासंगिक है. जीवन की पाठशाला के सबसे बड़े गुरु श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव हम सभी के लिए उनके द्वारा दिए जीवन-दर्शन को अपने आचरण में उतारने का अवसर भी है.

कुरुक्षेत्र में अपने सारे सगे- संबंधियों को युद्ध भूमि में सामने देखकर जब अर्जुन मोह, भय और भ्रम से घिर गए थे तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन की सारी शंकाएँ सुनीं और उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्हें व्यापक दृष्टि देकर विराट दृष्टा बनाया था. सच्चे गुरु की यही पहचान है कि वह शिष्य को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाते बल्कि उसे स्वयं निर्णय लेने योग्य बनाते हैं.

श्री कृष्ण का पहला और प्रधान संदेश है भावनाओं के बीच विवेक को मत खोइए. जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आएँगी लेकिन उनसे भागना समाधान नहीं है. महागुरु श्री कृष्ण के अमर संदेश “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” के अनुसार हमारा अधिकार सिर्फ़ हमारे कर्म पर है उसके परिणाम पर नहीं. इसलिए परिणाम की चिंता किए बग़ैर वर्तमान के कर्म को पूरी ऊर्जा और उत्साह से करना चाहिए.

कृष्ण एक गुरु की तरह निडरता सिखाते हुए कहते हैं “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ.” जिसका अर्थ है कमजोरी को अपने ऊपर हावी मत होने दो, उठो और अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए तैयार हो जाओ. उनके द्वारा दिए गए गीता के ज्ञान में ‘ज्ञान’ को ही सर्वोपरि बताया गया है. श्री कृष्ण के दिए गए ज्ञान में सफलता-असफलता, सुख-दुख, लाभ-हानि में समत्व बनाए रखने के संदेश हैं.

गीता के अंत में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं “विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु” जिसका मतलब है मैंने तुम्हें ज्ञान समझा दिया है अब तुम अपने विचार और विवेक से जैसा उचित समझो वैसा करो. एक महान गुरु के रूप में श्री कृष्ण सभी को रास्ता तो अवश्य दिखाते हैं मगर चलने का निर्णय वे हमारे हाथ में छोड़ते हैं. जन्माष्टमी के अवसर आइए मंदिर में स्थापित श्री कृष्ण को अपने विचार, कर्म, साहस, विवेक और व्यवहार में भी स्थापित करें.

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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