A thread of love binds stronger than chains of gold… भाई-बहन के स्नेह का पवित्र उत्सव है रक्षाबंधन। थाली में रोली, अक्षत और रेशम की साधारण-सी मौली लेकर भाई की कलाई पर रक्षा का धागा बाँधने वाली बहनों की थाली अब आर्थिक रूप से बहुत महंगी होने लगी है। एक दौर था जब पवित्र भावनाओं मे भीगी हुई रेशमी राखी बेशकीमती हुआ करती थी। बढ़ते समय चक्र और बाजार की आधुनिक हवा से सोने, चाँदी, हीरे और डिज़ाइनर राखियों की चमक इतनी बढ़ गई है कि राखी मे रेशम की सादगी ढूँढे नहीं मिलती।
महँगी राखियाँ देखने में आकर्षक होती हैं लेकिन उसमे मौली और रेशम के संस्कार नदारद होते हैं। एक शानदार इंग्लिश proverb है The best things in life aren’t things. इसका मतलब है जीवन की सबसे अनमोल चीज़,कोई बस्तु नहीं रिश्ते होते हैं।
येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल यह प्रसिद्ध वैदिक और पौराणिक मंत्र रक्षाबंधन के पर्व पर भाई को राखी या रक्षासूत्र बांधते समय बोला जाता है। इस श्लोक का संक्षेप मे भावार्थ है कि जिस तरह माता लक्ष्मी ने सावन पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया था उसी तरह रक्षा सूत्र मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षासूत्र मेरे भाई को हर संकट से बचाना। मगर चांदी की राखी मे कहाँ है वो रक्षा सूत्र?
जिस तरह बाजार के विज्ञापन और रील्स ने हमें मिठाई और चॉकलेट का फर्क भुला दिया है ठीक उसी तरह उसने रक्षाबंधन की आत्मा को सोने चांदी मे कैद कर लिया है। आज के विज्ञापन इस पवित्र पर्व मे बहनों को उपहारों की लालची घोषित करने का प्रयास कर रहे है। इस भ्रामक प्रचार से उपजे झिझक के चलते बहुत सी बहनें बहुत से भाइयों को राखी नहीं बांध पातीं। महाभारत काल में जब भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी और उससे खून बहने लगा था तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्ला फाड़कर उनकी उंगली मे बांधा था। इस स्नेह से प्रसन्न होकर कृष्ण ने द्रौपदी की हमेशा रक्षा करने का वचन दिया था जिसे उन्होंने चीरहरण के समय निभाया। महाभारत में वर्णित रक्षासूत्र स्नेहबन्धनसमायुक्तं रक्षासूत्रं शुभप्रदम्। आयुष्यमारोग्यसौख्यं च सर्वदा ते प्रयच्छतु॥ कहता है स्नेह के बंधन से युक्त यह पवित्र रक्षासूत्र तुम्हारे लिए मंगलकारी हो। यह तुम्हें सदा दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि प्रदान करे। मगर सोने चांदी की राखियों मे कहाँ है रक्षा सूत्र?
बाज़ार के ट्रेंड को देखते हुए एक बात कि आशंका जागती है कि राखी कहीँ अपनी मूल भावनाओं को पीछे छोड़ते हुए एक फैशन एक्सेसरी या ब्रेसलेट न बन जाए। याद रखिए पर्वों की पहचान परंपराओं से है। Tradition is the soul of a culture. परंपरा किसी भी संस्कृति की आत्मा होती है। रेशम का धागा, कलावा, चंदन, अक्षत और दूर्वा जो हमारी संस्कृति के प्रतीक है इनसे ही बना करती थी पारंपरिक राखियाँ। बहन की रक्षा के साथ परंपराओं की रक्षा भी सभी की जिम्मेदारी है। आज रक्षा सूत्र स्वयं ख़तरे मे है अपनी रक्षा के लिए वो हमारी ओर निहार रहा है। आधुनिकता को अपनाने के लिए अपनी जड़ों को छोड़ना अच्छा नहीं।
एक संस्कृत शुभाशीष श्लोक भ्राता रक्षति भगिनीं स्नेहेन धर्मसंयुतः। भगिनी प्रार्थयते नित्यं भ्रातुरायुः सुखं शुभम्॥ इसका अर्थ है भाई स्नेह और धर्म का पालन करते हुए अपनी बहन की रक्षा करता है और बहन प्रतिदिन अपने भाई की लंबी आयु, सुख, समृद्धि और शुभ जीवन की प्रार्थना करती है। सवाल यही है कि यह कोमल भावनाएँ सोने चांदी की ज़ंजीरों मे कब तक बची रह सकती है।
चित्तौड़ की रानी कर्णावती पर जब बहादुर शाह ने आक्रमण किया था तब अपनी रक्षा के लिए रानी ने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी उस राखी मे सोने चांदी की कोई भूमिका नहीं थी। हुमायूं ने धर्म की इस मर्यादा का सम्मान करते हुए उनकी मदद के लिए अपनी सेना भेजी थी।
सभी भाई बहनों को यह समझना होगा कि राखी मे प्रेम की चमक ही कीमती है। रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर बँधा हुआ पारंपरिक रेशम का धागा संसार का सबसे अनमोल आभूषण होता है। Love is priceless, भाई के कलाई मे बंधी रेशमी राखी, रिश्तों को जोड़ती है, भरोसे को मज़बूत करती है और भारतीय संस्कृति की सुगंध को जीवित रखती है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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