हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्यप्रदेश की सियासत में अब UCC यानी समान नागरिक संहिता 2028 के चुनावी रण का बड़ा मुद्दा बनती नजर आ रही है। खास बात यह है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस का रुख सामने आने लगा है, लेकिन जब Lalluram.com ने कांग्रेस के बड़े नेताओं से सीधे सवाल किए तो तस्वीर कुछ अलग नजर आई।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जहां UCC को लेकर खुलकर मोर्चा संभाल लिया, वहीं PCC चीफ जीतू पटवारी सवाल से बचते नजर आए। प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से भी जब इसी मुद्दे पर सवाल किया गया तो उन्होंने बातचीत को राहुल गांधी के प्रस्तावित इंदौर दौरे की बैठक तक सीमित रखने की बात कही।

उमंग सिंघार का बड़ा ऐलान- 2028 में सरकार आई तो UCC खत्म

उमंग सिंघार ने साफ शब्दों में कहा है कि 2028 में कांग्रेस की सरकार बनती है तो UCC को खत्म कर दिया जाएगा। उन्होंने इसे ‘काला कानून’ बताते हुए आरोप लगाया कि यह कानून लोगों पर जबरदस्ती थोपा गया है।
यानी कांग्रेस की तरफ से अब UCC को लेकर सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि सत्ता में आने के बाद कानून को वापस लेने का राजनीतिक वादा सामने आ गया है।

लेकिन सवाल उठते ही PCC चीफ ने क्यों बनाई दूरी?

सियासी हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा उस वक्त की है, जब Lalluram.com ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से UCC को लेकर सवाल किया। सवाल सामने आते ही पटवारी वहां से निकल गए।अब सवाल यही है कि जिस मुद्दे को कांग्रेस 2028 के चुनाव में बड़ा राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी कर रही है, उस पर प्रदेश अध्यक्ष खुलकर जवाब देने से क्यों बच रहे हैं?क्या कांग्रेस के भीतर UCC को लेकर रणनीति पूरी तरह तय नहीं है? या फिर पार्टी के बड़े नेता इस संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग सुर देने से बचना चाहते हैं?

हरीश चौधरी ने भी सवाल को टाल दिया

यही सवाल कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से किया गया तो उन्होंने कहा कि वह राहुल गांधी के इंदौर दौरे को लेकर बैठक में शामिल होने पहुंचे हैं और आज सिर्फ उसी विषय पर बात करेंगे।यानी UCC पर सवाल आया और जवाब राहुल गांधी के दौरे की बैठक तक सीमित रह गया।
ऐसे में राजनीतिक सवाल खड़ा होना लाजिमी है, अगर कांग्रेस इस कानून को सत्ता में आने के बाद खत्म करने का वादा कर रही है, तो फिर पार्टी के संगठन के सबसे बड़े नेताओं से इस पर खुलकर जवाब क्यों नहीं मिल रहा?

कांग्रेस के भीतर दिख रहे ‘दो सुर’?

एक तरफ उमंग सिंघार खुले मंच से UCC खत्म करने का ऐलान कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी इस सवाल पर सीधे जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं।कांग्रेस ने पहले ही संकेत दिए हैं कि UCC के खिलाफ बड़ा राजनीतिक अभियान चलाने की तैयारी है और इसे आगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाया जा सकता है। यानी मैदान में मुद्दा कांग्रेस के लिए बड़ा है, लेकिन मंच पर नेताओं की आवाज एक जैसी नहीं दिख रही।

पहले विधानसभा में विरोध, अब 2028 में खत्म करने का वादा

मध्यप्रदेश विधानसभा में UCC विधेयक 21 जुलाई 2026 को भारी हंगामे के बीच पारित हुआ था। कांग्रेस विधायकों ने इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग की थी और सदन में विरोध किया था। इसके बाद राज्यपाल ने विधेयक को मंजूरी देकर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आगे भेजा है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही इसके प्रावधान प्रभावी हो सकेंगे। विधेयक में विवाह पंजीयन, बहुविवाह पर रोक, तलाक की कानूनी प्रक्रिया और लिव-इन संबंधों के पंजीयन जैसे प्रावधान शामिल हैं, जबकि अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

अब UCC सिर्फ कानून नहीं, 2028 का चुनावी हथियार?

बीजेपी इसे समानता और समान नागरिक अधिकारों से जोड़कर ऐतिहासिक कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे लेकर गंभीर आपत्तियां जता रही है। अब उमंग सिंघार के बयान ने इस टकराव को सीधे 2028 के चुनाव से जोड़ दिया है।

कांग्रेस का संदेश साफ है-सरकार बनी तो UCC खत्म 

लेकिन उसी कांग्रेस से सवाल यह है कि क्या यह पूरी पार्टी का आधिकारिक और एकमत फैसला है? अगर हां, तो PCC चीफ जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी इस सवाल पर खुलकर जवाब देने से क्यों बच रहे हैं?

2028 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन UCC पर सियासी रण शुरू हो चुका है। एक तरफ बीजेपी कानून को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस सत्ता में आते ही इसे खत्म करने का वादा कर रही है। अब देखना होगा कि जनता के बीच UCC का मुद्दा किसके लिए राजनीतिक ताकत बनता है और किसके लिए सियासी मुसीबत।

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