अमित पाण्डेय, खैरागढ़। मंदिरों के नाम आमतौर पर किसी स्थान, संत या शासक से जुड़े होते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में स्थित श्री गैंद बिहारी सरकार मंदिर की पहचान इससे बिल्कुल अलग है। इस मंदिर का नाम किसी राजा या स्थान पर नहीं, बल्कि एक रानी की भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अगाध भक्ति से जुड़ा माना जाता है। यही कारण है कि यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के बीच ‘श्री गैंद बिहारी सरकार’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इस मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि खैरागढ़ रियासत की राजवंशीय परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और करीब डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही रथयात्रा की परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। खैरागढ़ के स्थानीय इतिहास के जानकार भागवत शरण सिंह ने राजवंशीय वंशावली, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर मंदिर के इतिहास और नामकरण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।

राजा थे देवी उपासक, रानी थीं श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त

भागवत शरण सिंह के अनुसार, खैरागढ़ रियासत के यशस्वी शासक महाराजा कमल नारायण सिंह देवी बम्लेश्वरी, मां दंतेश्वरी और मां शीतला के परम उपासक थे। धार्मिक साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने ‘शीतला जस मालिका’ जैसी रचना भी की थी।

वहीं उनकी धर्मपत्नी रानी गैंद कुंवर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थीं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रानी की इसी गहरी कृष्ण भक्ति से प्रभावित होकर राजपरिवार ने भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह को ‘गैंद बिहारी’ नाम से प्रतिष्ठित किया। समय के साथ यही नाम मंदिर की स्थायी पहचान बन गया और आज यह मंदिर श्री गैंद बिहारी सरकार के नाम से विख्यात है।

स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि यह संभवतः देश के उन विरले मंदिरों में शामिल है, जहां भगवान श्रीकृष्ण का स्थानीय नामकरण सीधे किसी रानी की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। हालांकि इस परंपरा का व्यापक अकादमिक दस्तावेजीकरण सीमित है और इसे स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।

ऐसे बना ‘खड़गढ़’ से ‘खैरागढ़’

भागवत शरण सिंह के मुताबिक, नागवंश की वंशावली में राजा टिकैत राय को खैरागढ़ का प्रथम संस्थापक माना जाता है। उनके पिता राजा खड़्गराय थे। स्थानीय मान्यता है कि उनके नाम पर इस क्षेत्र का नाम पहले ‘खड़गढ़’ पड़ा। बाद में क्षेत्र में खैर के वृक्षों की अधिकता और समय के साथ बोलचाल में आए बदलाव के कारण इसका नाम ‘खैरागढ़’ हो गया।

उपलब्ध राजवंशीय वंशावली के अनुसार, राजा टिकैत राय के पुत्र दृगपाल सिंह हुए। आगे चलकर इसी वंश में उज्जैन कुंवरी बाई, फिर सुगंधी बाई और बाद में रानी गैंद कुंवर का जन्म हुआ। रानी गैंद कुंवर का विवाह महाराजा कमल नारायण सिंह से हुआ। इसके बाद उनकी कृष्ण भक्ति ने भगवान श्रीकृष्ण को ‘गैंद बिहारी’ के रूप में नई पहचान दिलाई।

यहीं से निकलती है खैरागढ़ की सबसे प्राचीन रथयात्रा

श्री गैंद बिहारी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि खैरागढ़ की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं का भी प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पिछले लगभग 150 वर्षों से इसी मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की भव्य रथयात्रा निकाली जाती रही है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस परंपरा में शामिल होकर इसे जीवंत बनाए रखते हैं।

धार्मिक जानकारों का मानना है कि इतनी लंबी अवधि से निरंतर चली आ रही यह रथयात्रा आज खैरागढ़ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

राजमहल और मंदिरों के इतिहास में बढ़ी लोगों की दिलचस्पी

पिछले कुछ वर्षों में खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों के प्रति लोगों की रुचि एक बार फिर बढ़ी है। कमल विलास पैलेस परिसर के ऐतिहासिक मंदिरों और दरबार हॉल को आम लोगों के लिए खोले जाने के बाद स्थानीय इतिहास चर्चा का प्रमुख विषय बना। उस दौरान भी स्थानीय इतिहासकार भागवत शरण सिंह ने राजमहल, महाराजा कमल नारायण सिंह और मंदिरों के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए थे।

श्री गैंद बिहारी मंदिर बना खैरागढ़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक

आज श्री गैंद बिहारी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल भर नहीं है। यह खैरागढ़ की राजशाही, सनातन परंपरा, कृष्ण भक्ति, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। मंदिर का नाम लेते ही खैरागढ़ की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान स्वतः सामने आ जाती है।

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