नदी यात्रा से लौटकर वैभव बेमेतरिहा की रिपोर्ट-

रायपुर। खारुन नदी कथा-1 में ये कहानी है तरीघाट से महादेव घाट के बीच की. तरीघाट(पाटन) से खारुन नदी जैसे-जैसे महादेव घाट (रायपुर) की ओर आगे बढ़ती जाती है. अपनी करुण कथा को कहती जाती है. तरीघाट के पास खारुन नदी काफी चौड़ी दिखाई पड़ती है. लेकिन परसुलीडीह से लमकेनी पहुँचते-पहुँचते नदी की चौड़ाई पहले से कम हो जाती है.

तरीघाट गाँव की सीमा समाप्त होते ही कुछ दूरी जाने के बाद नदी में दोनों किनारे पर चलने के लिए कोई जगह शेष नहीं रह जाती. दोनों ही हिस्सों में खेती करने वालों का तार घेरा दिखाई देने लगता है. लमकेनी में नदी किनारे जाने के लिए खेतों को, तार घेरा को पार कर नीचे की ओर जाना पड़ता है. जहाँ आपके हिस्से नदी के पास खड़े होने तक जगह नहीं.

लमकेनी से आगे बढ़ने पर ढोंडरा गाँव मिलता है. ढोंडरा के पास कुछ हिस्से पर नदी का तट फिर से पैदल चलने योग्य मिल जाता है. हालांकि ऐसी स्थिति कुछ दूर तक ही होती है. ढोंडरा गाँव को पार करते ही खारुन की दुर्दशा की भयानक तस्वीर दिखाई देती है. यहाँ नदी किनारे दोनों ही ओर बेतहाशा खनन हुआ दिखाई देता है. रेत और मुरुम खनन से नदी तट पूरी तरह से खत्म हो गया है. नदी का पाट इस हिस्से पर तरीघाट से ज्यादा चौड़ी दिखाई पड़ती है. वहीं नदी की दो-तीन धाराएं बहने लगती है.

ढोंढरा के आगे खट्टी जाने के लिए नदी किनारे का रास्ता फिर बंद हो जाता है. फार्म हाउस, रिसॉर्ट बने हैं और इनकी पहुँच नदी में पानी तक है. इस रास्ते नदी किनारे जाया ही नहीं जा सकता. ढोंढरा के आगे खट्टी गाँव है. खट्टी गाँव में कुछ दूर नदी का तट फिर चलने लायक मिलता है, लेकिन टोला घाट तक जाने के लिए तटीय रास्ता नहीं.

टोला घाट के पास नदी फिर से थोड़ी चौड़ी नजर आती है, लेकिन खनन और अतिक्रमण से मुक्त नहीं. टोला घाट से आमदी जाने वाला तटीय रास्ता कुछ दूरी पर जाकर फिर बंद हो जाता है. आमदी गाँव पहुँचने पर खारुन की स्थिति थोड़ी अच्छी दिखती है. आमदी गाँव में दोनों किनारे पर काफी दूर तक तटीय रास्ता दिखता है. आमदी के आगे मोंडरा-जमराव के पास नदी फिर से काफी चौड़ी हो जाती है. मोडरा और जमराव गाँव से आगे दोनों छोर पर फिर नदीं किनारे पर रास्ता बंद मिलता है.

इसी रास्ते आगे बढ़ने पर दतरेंगा, काठाडीह, खुड़मुड़ा और फिर महादेव घाट तक नदी की चौड़ाई कम हो जाती है. और नदी में दोनो छोर पर तटीय रास्ता भी बंद मिलता है. नदी किनारे-किनारे पैदल चलने तक की जगह मिलती है. क्योंकि नदी के दोनों किनारे पर वही खेत, बाड़ी और रिसॉर्ट दिखाई पड़ते हैं.

तरीघाट से महादेव घाट तक 30 किलोमीटर की इस यात्रा में खारुन में खनन और अतिक्रमण कई स्थानों पर स्पष्ट दिखाई देता है. कही तट पर पचरी है, तो कहीं उसी पचरी के हिस्से पर दोनों तरफ का रास्ता बंद है. आखिर ये कैसे संभव हुआ है यह समझ से परे है ? खारुन को बचाने के लिए तटीय हिस्सों में खनन को रोकना और अतिक्रमण से उसे मुक्त कराना होगा. और यह सिर्फ शासन और प्रशासन के भरोसे नहीं हो सकता है. समाज की भागीदारी इसमें सबसे अधिक है.

अगली स्टोरी में आपको बताएंगे खारुन की दुर्दशा आखिर और कैसे हो रही है ? राजधानी के हिस्से निगम क्षेत्र में गाँवों से भी बुरी स्थिति में खारुन क्यों है ?

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