दिल्ली में जमीन या मकान के मालिक और बिल्डर के बीच होने वाले करारनामे को अब रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य किया जा सकता है। दिल्ली सरकार संपत्ति के रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों में बदलाव करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच हुए करार को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराना जरूरी होगा। अधिकारियों के मुताबिक, इस बदलाव का उद्देश्य संपत्ति के बंटवारे और मालिकाना हक को लेकर सामने आने वाले विवादों को कम करना है। सरकार का मानना है कि करार को आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड कराने से दोनों पक्षों के अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट रहेंगी।

करार के लिए देना होगा 1% शुल्क

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच होने वाले करार के रजिस्ट्रेशन पर एक प्रतिशत शुल्क लिया जा सकता है। अभी ऐसे करार कई मामलों में स्टांप पेपर पर किए जाते हैं, लेकिन प्रस्तावित बदलाव लागू होने के बाद केवल स्टांप पेपर पर करार करना पर्याप्त नहीं होगा। अधिकारियों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट में प्रस्तावित संशोधन के बाद बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच होने वाले ऐसे करार को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य करार को कानूनी रूप से अधिक मजबूत और आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाना है।

दिल्ली में संपत्ति के बंटवारे और मालिकाना हक को लेकर होने वाले कानूनी विवादों को कम करने के लिए दिल्ली सरकार संपत्ति रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद जमीन मालिक और बिल्डर के बीच होने वाले करार को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराना अनिवार्य हो सकता है। इसके लिए करार की राशि पर एक फीसदी शुल्क लिए जाने का प्रस्ताव है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच होने वाले समझौतों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार होगा और भविष्य में संपत्ति के हिस्से या मालिकाना हक को लेकर होने वाले विवादों में कमी आ सकती है।

छोटे प्लॉटों पर ज्यादा होता है बिल्डर-मालिक का समझौता

दिल्ली में खासतौर पर 80 से 100 गज के छोटे प्लॉटों पर जमीन मालिक और बिल्डर के बीच मिलकर 3-4 मंजिला मकान या फ्लैट बनाने का चलन काफी अधिक है। ऐसे मामलों में दोनों पक्ष आपसी सहमति से संपत्ति के हिस्से तय कर लेते हैं। कई मामलों में बिल्डर और जमीन मालिक के बीच होने वाला समझौता केवल 50 या 100 रुपये के स्टांप पेपर पर ही किया जाता है। कुछ करारों में संपत्ति के किसी फ्लोर के बदले नकद भुगतान जैसी शर्तें भी शामिल होती हैं।

केवल स्टांप पेपर पर करार से बढ़ते हैं विवाद

अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे समझौतों का पर्याप्त आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होने के कारण बाद में संपत्ति के हिस्से, भुगतान या मालिकाना हक को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है। कई मामलों में करार की शर्तों को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ जाते हैं और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच जाता है। प्रस्तावित नियम के तहत ऐसे करार को केवल स्टांप पेपर पर करना पर्याप्त नहीं होगा। इसे सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर्ड कराना जरूरी होगा।

सरकार को भी मिलेगा अतिरिक्त राजस्व

इस व्यवस्था से सिर्फ संपत्ति विवादों पर अंकुश लगाने में ही मदद मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में कम मूल्य के स्टांप पेपर पर किए जाने वाले ऐसे समझौतों से सरकार को अपेक्षित राजस्व नहीं मिल पाता। अगर प्रस्तावित व्यवस्था लागू होती है तो करार के रजिस्ट्रेशन पर एक फीसदी शुल्क लिया जा सकता है। इससे इन लेनदेन का सरकारी रिकॉर्ड भी तैयार होगा और संबंधित पक्षों के अधिकार अधिक स्पष्ट तरीके से दर्ज किए जा सकेंगे।

खरीदारों की जेब पर भी पड़ेगा असर

अधिकारियों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट में प्रस्तावित बदलाव लागू होने के बाद सिर्फ स्टांप पेपर पर किया गया करार कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं होगा। बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच हुए एग्रीमेंट का समय पर पंजीकरण नहीं कराया गया तो भविष्य में फ्लैट की बिक्री के दौरान परेशानी हो सकती है। ऐसे मामलों में लंबित करारनामे का रजिस्ट्रेशन शुल्क वसूला जा सकता है। इसका अतिरिक्त एक फीसदी आर्थिक भार खरीदार पर पड़ने की संभावना है। यानी फ्लैट खरीदते समय यदि पुराने करार का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है तो बाद में उसके शुल्क की जिम्मेदारी खरीदार पर आ सकती है।

GPA से प्रॉपर्टी ट्रांसफर पर भी सख्ती

दिल्ली सरकार जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के जरिए संपत्ति ट्रांसफर को लेकर भी सख्त रुख अपना रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ब्लड रिलेशन के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति को GPA के जरिए संपत्ति ट्रांसफर करने पर स्टांप ड्यूटी वसूली जा सकती है। कितना स्टांप शुल्क लिया जाएगा, यह कलेक्टर ऑफ स्टांप तय कर सकता है। इसके लिए संपत्ति और लेनदेन की प्रकृति समेत अन्य पहलुओं को आधार बनाया जा सकता है। दिल्ली सरकार रजिस्ट्रेशन एक्ट में प्रस्तावित बदलाव के तहत GPA के जरिए संपत्ति ट्रांसफर पर 4 फीसदी स्टांप शुल्क लगाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है। हालांकि, अंतिम शुल्क और नियमों को लेकर सरकार की ओर से अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है।

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