Automobile Desk – ​पुरानी गाड़ी खरीदना जेब के लिहाज से एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है, लेकिन सेकेंड हैंड ऑटोमोबाइल मार्केट में धोखाधड़ी के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। इन दिनों सबसे ज्यादा देखा जाने वाला फ्रॉड ओडोमीटर से छेड़छाड़ का है। रीसेल वैल्यू बढ़ाने और गाड़ी को ‘कम चली हुई’ साबित करने के लिए मीटर की रीडिंग को पीछे कर दिया जाता है। डिजिटल ओडोमीटर आने के बाद भी यह फर्जीवाड़ा रुका नहीं है, बल्कि अब सॉफ्टवेयर की मदद से इसे और आसानी से अंजाम दिया जा रहा है। अगर आप भी सेकेंड हैंड कार खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो सिर्फ मीटर रीडिंग देखकर डील फाइनल करने की भूल बिल्कुल न करें।

गाड़ी का इंटीरियर खोलता है असली पोल

​कार की रीडिंग चाहे जितनी भी कम दिख रही हो, गाड़ी का कैबिन उसके वास्तविक इस्तेमाल की कहानी खुद बयां कर देता है। अगर ओडोमीटर 30,000 किलोमीटर दिखा रहा है लेकिन ड्राइवर सीट की कुशनिंग दबी हुई है, स्टीयरिंग व्हील का लेदर या प्लास्टिक घिसकर चमकदार हो चुका है और गियर लीवर व पेडल्स (एक्सीलेटर, ब्रेक, क्लच) के रबड़ काफी घिस चुके हैं, तो समझ जाएं कि मीटर के साथ छेड़छाड़ की गई है। कोई भी कार 40-50 हजार किलोमीटर से पहले अंदर से इतनी पुरानी नहीं दिखती।

सर्विस हिस्ट्री और बिलिंग की गहराई से पड़ताल

​मीटर फ्रॉड को पकड़ने का सबसे पुख्ता तरीका अधिकृत (ऑथराइज्ड) सर्विस सेंटर का रिकॉर्ड होता है। जब भी कार की रूटीन सर्विस होती है, वर्कशॉप अपने डेटाबेस में किलोमीटर और तारीख दर्ज करती है। कार मालिक से उसकी पूरी सर्विस बुक मांगें। अगर बिल उपलब्ध नहीं हैं, तो कार के ब्रांड के किसी भी आधिकारिक डीलरशिप पर जाकर व्हीकल आइडेंटिफिकेशन नंबर (VIN) के जरिए सर्विस हिस्ट्री निकलवाएं। इसके अलावा, पुराने इंश्योरेंस पेपर्स, पॉल्यूशन सर्टिफिकेट (PUC) और टोल की पर्चियों पर दर्ज किलोमीटर की तारीखों से तुलना करके भी सच का पता लगाया जा सकता है।

ECU स्कैनिंग और डायग्नोस्टिक टेस्ट

​आधुनिक कारों में ओडोमीटर के अलावा इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) भी होता है, जो गाड़ी की हर एक गतिविधि और वास्तविक रनिंग का डेटा स्टोर करता है। कई बार जालसाज डैशबोर्ड के मीटर में रीडिंग कम कर देते हैं, लेकिन ECU के अंदर की जानकारी को मिटाना या बदलना बेहद मुश्किल होता है। किसी भरोसेमंद ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट या आधुनिक वर्कशॉप में OBD-II (ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स) स्कैनर लगवाकर गाड़ी के असली किलोमीटर की जांच कराई जा सकती है।

पार्ट्स का घिसाव और सस्पेंशन की स्थिति

​गाड़ी के टायर, ब्रेक पैड, डिस्क और सस्पेंशन जैसी चीजें भी उसकी सही उम्र बताती हैं। आमतौर पर कंपनी के साथ आए ओरिजिनल टायर 40,000 से 50,000 किलोमीटर तक चलते हैं। अगर ओडोमीटर में 20,000 किलोमीटर दर्ज है लेकिन टायर पूरी तरह नए बदलवाए गए हैं या बेहद घिसे हुए हैं, तो यह सीधे तौर पर संदेह पैदा करता है। टेस्ट ड्राइव के दौरान इंजन की आवाज, गियर शिफ्टिंग का स्मूथ होना और सस्पेंशन से आने वाली आवाजों पर ध्यान दें। बहुत ज्यादा आवाज या झटके इस बात का संकेत हैं कि गाड़ी मीटर में दिख रही दूरी से कहीं ज्यादा तय कर चुकी है।