सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उन फैसलों को पलट दिया है, जिन फैसलों के मुताबिक शादीशुदा बेटी अपने माता-पिता के परिवार में नहीं आती है और इसलिए उसे अनुकंपा लाभ नहीं मिल सकता है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि विवाहित बेटी को बाहर रखना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है। फैसले में कहा है कि माता-पिता के ना रहने पर उनपर आश्रित विवाहित पुत्री अनुकंपा रोजगार की पात्र है.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कहा है कि अगर शादीशुदा बेटी अन्य सभी शर्तें पूरी करती है तो उसका दावा सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को पलटते हुए कहा की सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या कल्याणकारी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है, अगर शादीशुदा बेटी अनुकंपा नियुक्ति की सभी शर्तें पूरी करती है तो. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि माता-पिता के ना रहने पर उनपर आश्रित विवाहित पुत्री अनुकंपा रोजगार की पात्र है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अपने फैसले में ये बातें कहीं.

पीठ ने आगे कहा कि वह बॉम्बे हाई कोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन सभी निर्णयों से सहमत है, जिनमें कहा गया है कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र पुत्री को कल्याणकारी योजना से वंचित करने का वैध आधार नहीं बन सकती है.

पीठ ने यह सब इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक सिंगल बेंच द्वारा सर्वोच्च अदालत को भेजे गए एक संदर्भ से संबंधित है, जिसमें यह पूछा गया था कि क्या विवाहित पुत्रों के मामले में ऐसी कोई अक्षमता न होने पर भी विवाहित पुत्रियों के अनुकंपा नियुक्ति के दावों को अस्वीकार किया जा सकता है.

इस मामले में याचिकाकर्ता, जो एक विवाहित पुत्री है. उसने अनुकंपा के आधार पर उचित दुकान चलाने के लाइसेंस के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. शादीशुदा होने के बावजूद वह अपने परिवार के साथ रहते हुए अपनी मां के साथ दुकान चलाती थी और अपनी विकलांग बहन की देखभाल करती थी. अपनी मां के निधन के बाद याचिकाकर्ता ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था.

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