अभय मिश्रा, मऊगंज। आज आपको डिजिटल इंडिया और विकास के दावों की वो शर्मनाक तस्वीर दिखाएंगे, जिसे देखकर शायद प्रशासनिक संवेदनशीलता को भी अंजलि (चुल्लू) भर पानी में डूब जाना चाहिए। मामला नवगठित मऊगंज जिले का है। जहां के ग्राम पंचायत हाटा के कोढबा और जिल्की टोला के आदिवासी और यादव परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। तपती गर्मी में जब ये ग्रामीण मीडिया के सामने अपनी व्यथा रखते हैं, तो पीएचई (PHE) विभाग के अधिकारी मऊगंज से एक ‘कागजी जादू’ चलाते हैं और लिख देते हैं कि गांव में पानी की कोई कमी नहीं है! इस झूठ से आहत होकर, 45 डिग्री की इस झुलसा देने वाली गर्मी में बूढ़े, बुजुर्ग और महिलाएं 55 किलोमीटर का सफर तय करके खाली डिब्बे लेकर कलेक्टर संजय कुमार जैन के दरवाजे पर बैठ गए। लेकिन साहब को फुर्सत नहीं मिली।

यह तस्वीरें किसी आदिम युग की नहीं, बल्कि साल 2026 के मऊगंज जिले की हैं। जहां जिल्की टोला के ग्रामीण पिछले 30 सालों से नदी के किनारे गड्ढा खोदकर, मटमैला पानी छानकर पीने को मजबूर हैं। इसी पानी से इंसानों का हलक भी तर होता है और मवेशी भी यही पानी पीते हैं। भीषण गर्मी में यहां से पलायन मजबूरी बन जाता है। कोढबा टोला का हाल भी जुदा नहीं है, जहां 20 से ज्यादा परिवार एक बीमार हैंडपंप के भरोसे हैं, जिसमें 4 घंटे इंतजार के बाद सिर्फ 8 बाल्टी पानी आता है। सुबह 4 बजे से लाइन लगती है और शाम ढलने तक सिर्फ प्यास ही हाथ आती है।”

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जल जीवन मिशन का पीटा जा रहा ढिंढोरा

लेकिन रुकिए! जनता की इस चीख पर प्रशासन का दिल नहीं पिघला, बल्कि उनका ‘पेन’ चला। पीएचई विभाग के सहायक यंत्री ने एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की, जिसे सुनकर आपको हंसी भी आएगी और गुस्सा भी। सरकारी कागजों में दावा किया गया कि गांव में पर्याप्त पानी है, जल जीवन मिशन का काम चल रहा है और 8 इंची बोर चालू है। हकीकत यह है कि जिस बोर का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसमें आज तक मोटर ही नहीं डली! हद तो तब हो गई जब अधिकारियों ने गांव के प्रभावित आदिवासियों से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा। एक रसूखदार के घर बैठकर पंचनामा तैयार कर लिया गया। अब सवाल यह है कि अगर जांच इतनी ही सच्ची थी, तो उस सरकारी पंचनामे पर शिकायतकर्ता किसी भी आदिवासी के दस्तखत क्यों नहीं हैं?

उचित कार्रवाई’ का मिला लॉलीपॉप!

जब हक की आवाज को प्रशासन ने ‘भ्रामक’ बताकर खारिज कर दिया, तो आदिवासियों का सब्र टूट गया। शनिवार की झुलसाती धूप में, 55 किलोमीटर दूर से भूखे-प्यासे ये ग्रामीण मऊगंज कलेक्ट्रेट पहुंचे। शनिवार होने के कारण जब कलेक्टर संजय कुमार जैन दफ्तर में नहीं मिले, तो न्याय की आस में ये सीधे कलेक्टर निवास के गेट पर जाकर बैठ गए। हाथ में खाली डिब्बे सिस्टम के मुंह पर तमाचा मार रहे थे। करीब एक घंटे तक चले हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद, प्रशासनिक अमला जागा। एसडीएम, एसडीओपी और पुलिस के साथ मौके पर पहुंचा। कलेक्टर साहब तो बाहर नहीं आए, लेकिन अधीनस्थ अधिकारियों ने आवेदन लेकर हमेशा की तरह ‘उचित कार्रवाई’ का लॉलीपॉप थमा दिया।

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प्रशासन से सीधा सवाल

ग्रामीण का कहना है कि साहब, हम लोग झूठ नहीं बोल रहे। अगर पानी मिल रहा होता तो हम 55 किलोमीटर दूर अपना घर-बार छोड़कर यहां खाली डिब्बा लेकर क्यों आते? अधिकारी गांव आए, गाड़ी से उतरे भी नहीं, एक घर में बैठकर कागज बना लिए और हमें झूठा साबित कर दिया। हमारे बच्चे गंदा पानी पीकर बीमार हो रहे हैं। लोकतंत्र में जब जनता की जायज मांग को प्रशासन ‘भ्रामक’ करार देने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि सिस्टम मोतियाबिंद का शिकार हो चुका है। मऊगंज प्रशासन से सीधा सवाल है कि क्या आप उन वीडियो और तस्वीरों को झुठला सकते हैं, जिसमें बुजुर्ग साइकिल पर पानी ढो रहे हैं? क्या आप उस झरिया (गड्ढे) को बंद करवा सकते हैं, जिससे ग्रामीण पानी पी रहे हैं? अगर जनता झूठी है, तो आपके पंचनामे पर उनके दस्तखत क्यों नहीं हैं?

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