अभय मिश्रा, मऊगंज। जिले के जमुहरा गांव के पास एक मां ने अपने दो साल के मासूम को मौत के मुंह से बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, लेकिन अफसोस जिस पुलिस को जनता का रक्षक कहा जाता है, वो डेढ़ घंटे तक तमाशबीन बनी रही।
पत्थर मारकर कांच तोड़ा, तब ट्रक रुका
हादसा इतना खौफनाक था कि ओवरलोड डस्ट से लदा हाइवा किरण कोल को करीब 100 मीटर तक घसीटता रहा। लोग चिल्लाते रहे, गुहार लगाते रहे, लेकिन बेखौफ ड्राइवर ट्रक नहीं रोक रहा था। जब ग्रामीणों ने पत्थर मारकर कांच तोड़ा, तब जाकर मौत की ये रफ्तार रुकी। चश्मदीदों का कहना है कि किरण कोल सड़क पर तड़पती रही, सांसें चल रही थीं, लेकिन पुलिस को 10 किमी घटनास्थल तक पहुंचने में 90 मिनट लग गए।
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हादसे से ज्यादा पुलिस की लापरवाही
परिजनों का आरोप है- किरण की मौत सड़क हादसे से ज्यादा पुलिस की लापरवाही से हुई है। अगर एंबुलेंस और पुलिस समय पर आ जाती, तो शायद एक मासूम के सिर से मां का साया नहीं उठता। यही वजह है कि सड़क पर सिर्फ जाम नहीं है, बल्कि उस खाकी के खिलाफ आक्रोश है जो अक्सर रसूखदारों के ओवरलोड वाहनों के सामने नतमस्तक नजर आती है।
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मासूम संजय गांधी अस्पताल रीवा रेफर
दो साल के मासूम की जान तो मां ने उसे दूर फेंक कर बचा ली, लेकिन मासूम अब सदमे में और कुछ बोल नहीं पा रहा है। उसे रीवा संजय गांधी अस्पताल रेफर किया गया है। दूसरी तरफ, जमुहरा की सड़क पर घंटों से लाश रखी है, ग्रामीण अड़े है और पुलिस समझाने की ‘नाकाम’ कोशिश कर रही है। सवाल ये है कि ओवरलोड यमराजों पर नकेल कब कसी जाएगी? और उस देरी का जिम्मेदार कौन है, जिसने एक तड़पती हुई महिला को अस्पताल की जगह मौत के मुंह में धकेल दिया?
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