अनिल मालवीय, इछावर(सीहोर)। मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक मुकम्मल सफर का विश्राम है। इस दार्शनिक सत्य को सीहोर जिले के इछावर क्षेत्र के ग्राम दीवाड़िया ने सच कर दिखाया है। यहां के वयोवृद्ध नागरिक गोविंद सिंह वर्मा जब 100 वर्ष से अधिक का एक समृद्ध, खुशहाल और संतोषजनक जीवन जीकर पंचतत्व में विलीन हुए, तो उनके परिजनों और ग्रामीणों ने इसे शोक की विदा नहीं, बल्कि एक पुण्यात्मा का ‘महाउत्सव’ बना दिया।
अंतिम यात्रा में वैराग्य और आनंद का अनूठा संगम
आमतौर पर जहां शवयात्रा सन्नाटे और सिसकियों के बीच से गुजरती हैं, वहीं दीवाड़िया गांव में दादाजी की अंतिम यात्रा का नजारा बिल्कुल जुदा था। यहां का वातावरण वैराग्य और आनंद के अनूठे संगम से सराबोर नजर आया। बेटों ने आंखों में आंसू रोकने की रूढ़िवादी कोशिश नहीं की, बल्कि पिता की अंतिम इच्छा का मान रखते हुए ढोल-ताशों और डीजे की सुमधुर लहरियों के साथ उन्हें विदा किया।
‘साहब… मैं जिंदा हूं!’ जिस बेटी की हत्या के आरोप में 22 दिन से जेल में थे पिता-भाई, वह अचानक लौट आई,
‘शताब्दी सफर’ का जश्न मनाया
कहते हैं कि एक भरा-पूरा जीवन जी लेने के बाद मृत्यु भी एक वरदान बन जाती है। गोविंद सिंह वर्मा ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने बेटों से एक मार्मिक इच्छा व्यक्त की थी। “जब मैं इस संसार से विदा लूं, तो माहौल में मातम या रुदन नहीं होना चाहिए, बल्कि खुशियों का संगीत गूंजना चाहिए।” पिता के इस अनूठे और जीवंत दर्शन को उनके दोनों बेटों, बाबूलाल और बद्री प्रसाद वर्मा ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह शिरोधार्य किया। उन्होंने समाज की पुरानी रूढ़ियों को दरकिनार कर अपने पिता के इस ‘शताब्दी सफर’ का जश्न मनाया।
विदाई में दिखा जीवन का असली उल्लास
इस अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोग गम की चादर ओढ़ने के बजाय, एक पूर्ण जीवन की पूर्णाहुति पर झूमते और नमन करते नज़र आए। यह दृश्य इस बात का जीवंत गवाह था कि यदि जीवन को पूरी शिद्दत और नेकी से जिया जाए, तो मौत भी अपना खौफ खो देती है और एक उत्सव में बदल जाती है।
महाप्रस्थान को पूरे जिला का नमन
सौ वर्षों की यह जीवन यात्रा केवल एक उम्र का आंकड़ा नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और संस्कारों की एक समृद्ध विरासत है। दादाजी का जाना परिवार और गांव के लिए एक शून्य जरूर छोड़ गया है, लेकिन उनकी विदाई का यह अनोखा अंदाज याद रखा जाएगा। दीवाड़िया गांव से उठी यह अंतिम यात्रा समाज को यह बड़ा संदेश दे गई कि विदाई केवल रुदन की मोहताज नहीं होती। शताब्दी पुरुष गोविंद सिंह वर्मा के इस महाप्रस्थान को आज पूरा जिला नमन कर रहा है।
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