लाल सागर में हूतियों की बढ़ती ताकत ने अब सऊदी अरब की नींद उड़ा दी है. कुछ दिनों पहले पाकिस्तान और तुर्की के साथ मुस्लिम नाटो यानि मक्का समझौते का भी उसे कोई फायदा नहीं मिल रहा है, ऐसे में उसे अब सीधे अमेरिका का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ा है. हालात इतने बिगड़ गए कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक नहीं, बल्कि दो बार फोन किया और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी हमले की मांग की. लेकिन ट्रंप ने उनकी इस अपील को ठुकरा दिया.

बता दें कि, हूती विद्रोहियों ने कुछ वक्त पहले ही मोचा शहर पर कब्जा किया है और बढ़ती संख्या में तेजी से दक्षिण की ओर बढ़ रहे हैं. जबकि सऊदी समर्थित यमनी बल पीछे हट रहे थे. ऐसी स्थिति में दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से Axios की रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया है कि MBS ने ट्रंप को फोन कर हालात की जानकारी दी.

अमेरिकी स्ट्राइक की मांग की

इसके कुछ घंटे बाद उन्होंने दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति से बात की और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी स्ट्राइक की मांग कर डाली. हालांकि, ट्रम्प ने यमन में बढ़ते संघर्ष को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने समूह के खिलाफ हमला करने से इनकार कर दिया. इससे पहले पाकिस्तान और तुर्की ने भी मक्का पैक्ट के बावजूद सऊदी की मदद करने से इनकार कर दिया था. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि ‘अभी ऐसी किसी चीज पर चर्चा नहीं हो रही है. सही समय आने पर हम समझौते के तहत कार्रवाई करेंगे.’ 

हालांकि, वॉशिंगटन ने सऊदी अरब को हूतियों के बारे में खुफिया जानकारी और टारगेटिंग डेटा देने पर सहमति जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 200 अमेरिकी सैन्यकर्मी पहले से ही सऊदी अरब में गैर-गतिशील सहायता दे रहे हैं.

MBS को क्यों पड़ी अमेरिका की जरूरत ?

दरअसल, हूतियों की बढ़त अब सिर्फ यमन की जंग तक सीमित नहीं रह गई है. हूती लड़ाकों के रणनीतिक तटीय इलाकों की ओर बढ़ने से वो बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के और करीब पहुंच रहे हैं. यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के साथ-साथ सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए भी बेहद अहम है. हूतियों की बढ़त के बीच तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया.

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ईरान पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए समुद्री आवाजाही पर दबाव बना रहा है ईरान पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को प्रभावित कर रहा है. ऐसे में अगर हूतियों का बाब अल-मंडाब पर कब्जा हो जाता है, तो ईरान के पास अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों पर दबाव बनाने का एक और बड़ा जरिया होगा.

मामले से जुड़े दो सोर्स के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर गुरुवार को सऊदी अरब पहुंचे. बताया जा रहा है कि उन्होंने वहां हालात पर तुरंत चर्चा के लिए अहम बैठकें कीं. वहीं, वाशिंगटन स्थित सऊदी एंबेसी और व्हाइट हाउस ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की.

ट्रंप ने क्यों रोका अमेरिकी हमला?

अमेरिका फिलहाल हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से बचना चाहता है. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वॉशिंगटन की प्राथमिकता लाल सागर में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और खुला रखना है, जबकि यमन के व्यापक संघर्ष को संभालने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय सहयोगियों पर छोड़ना चाहता है.

सऊदी अरब जहां हूतियों की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप चाहता है, वहीं ट्रंप प्रशासन एक और मोर्चा खोलने से बच रहा है. यही वजह है कि अमेरिका फिलहाल सीधे मिसाइल दागने के बजाय खुफिया और सैन्य सहयोग तक सीमित रहने की कोशिश कर रहा है.

हूती विद्रोहियों ने यमन के मोखा शहर पर कब्जा किया

यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है. यह शहर बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 75 किलोमीटर दूर है. यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार रास्ते में से एक है. मोखा पर पहले यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स का कंट्रोल था. यह हूतियों के खिलाफ लड़ने वाला सऊदी समर्थित गुट है. दोनों के बीच पिछले 9 दिनों से लड़ाई चल रही थी.

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