मुकेश मेहता, बुधनी। मध्य प्रदेश के बुधनी से एक ऐसी गंभीर तस्वीर सामने आई है जो मां नर्मदा की स्वच्छता को लेकर बड़े सवाल खड़े कर रही है। बुधनी क्षेत्र में फैक्ट्रियों से निकलने वाले रासायनिक और गंदे पानी का लगातार बहाव ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन गया है। ग्रामीणों का दावा है कि यह दूषित पानी पिछले कई वर्षों से लगातार बह रहा है, जो खेतों से होता हुआ कालियादेह नदी के रास्ते खर्रा घाट के पास सीधे मां नर्मदा तक पहुंच रहा है।
फैक्ट्रियों के आसपास से निकल रहा दूषित पानी और बदबू
इस पानी के बहाव को लेकर स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से शिकायत कर रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यह सिलसिला पिछले करीब 8 वर्षों से लगातार जारी है। पानी में भारी मात्रा में सफेद झाग दिखाई देता है और इससे इतनी तेज दुर्गंध उठती है कि आसपास से गुजरने वाले लोगों को मुंह ढंककर निकलना पड़ता है। इस पानी के कारण स्थानीय खेतों, पशुओं और आसपास के प्राकृतिक जलस्रोतों पर पड़ रहे बुरे प्रभावों को लेकर ग्रामीणों में गहरी चिंता है। उनका यह भी अंदेशा है कि इससे पशुओं की मौत, भूजल के प्रभावित होने और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

पानी के बहाव का रास्ता और कंपनियों के नाम
मैदानी हकीकत जानने के लिए जब ग्राउंड का निरीक्षण किया गया तो पानी के बहाव का पूरा रास्ता सामने आया। शुरुआती पड़ताल में वर्धमान फैक्ट्री की बाउंड्री के पास बने एक बड़े रास्ते से यह पानी बाहर निकलता दिखाई देता है। इसके बाद यह पानी बुधनी-सल्कनपुर रोड के नीचे बनी पुलिया से गुजरते हुए ट्राइडेंट और वर्धमान कंपनियों के बीच से होकर बहता है। इसी हिस्से में ट्राइडेंट की ओर से आने वाला पानी भी इसमें मिलता हुआ नजर आता है। इसके बाद यह पानी आगे बढ़कर खेतों से गुजरता हुआ करीब पांच किलोमीटर का लंबा रास्ता तय करता है।

कालियादेह नदी से होते हुए नर्मदा तक पहुंचता है पानी
ग्रामीणों के अनुसार दोनों कंपनियों की ओर से आने वाले पानी का यह बहाव आगे करीब आधा से एक किलोमीटर तक और बढ़ता है। इसके बाद यह पुराना देवगांव के पास कालियादेह नदी में जाकर मिल जाता है। ग्रामीणों का स्पष्ट दावा है कि इसी कालियादेह नदी के रास्ते से यह दूषित पानी आगे चलकर खर्रा घाट के पास मां नर्मदा में मिल रहा है, जिससे कालियादेह नदी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ रहा है। हालांकि इस पानी में कौन-कौन से रासायनिक तत्व मौजूद हैं और इससे पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य को कितना नुकसान पहुंच रहा है, इसकी वास्तविक पुष्टि केवल किसी उच्चस्तरीय वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आ सकेगी, क्योंकि मां नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन का मुख्य आधार है।

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