
Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128
सीक्रेट डील
सरकारी महकमों की स्टीयरिंग थामने का शौक भी क्या गजब होता है। एक साहब एक ऐसे विभाग की ड्राइविंग सीट पर बैठना चाहते हैं, जहां बिना किसी ब्रेक के सिर्फ एक्सीलेटर दबता हो और परमिट के नाम पर लक्ष्मी जी रोज़ाना सवारी करती हो, लेकिन ऐसी वीआईपी कुर्सी कोई मुफ्त में थोड़ी मिलती है, इसके लिए टोल टैक्स भी तो उसी लेवल का चुकाना पड़ता है। इस मलाईदार कुर्सी पर साहब को बिठाने का पूरा टेंडर एक ऐसे उस्ताद ने लिया है, जिनकी गलियारों में पहचान ही एक अमीर खाड़ी देश के नाम से है। नाम विदेशी लेकिन सेटिंग एकदम देसी और सॉलिड। डील ऐसी तगड़ी हुई कि साहब की ताजपोशी के लिए पूरे 50 लाख रुपये का शगुन सीधे सपनों की नगरी मुंबई पहुंचाया गया है। इस कैश की यात्रा का रूट भी बड़ा दिलचस्प रहा। यह 50 पेटी का पार्सल दुर्ग के अभेद्य रास्ते से होते हुए मुंबई में डिलीवर किया गया। इस पूरे मामले की सबसे शानदार बात है- भ्रष्टाचार की कौमी एकता। 50 लाख की इस भारी भरकम डिलीवरी के लिए जिस भरोसेमंद इंसान को चुना गया, वह अल्पसंख्यक समुदाय से आता है। मतलब साफ है, जब बात मनचाही पोस्टिंग और नोटों की गड्डियों की हो, तो हमारा सिस्टम एकदम सेक्युलर हो जाता है। यहां ना कोई जात पूछी जाती है ना धर्म, यहां सिर्फ गांधी जी का मजहब चलता है। अब गलियारों में हर कोई इसी सीक्रेट डील की चर्चा कर रहा है। बस इंतजार इस बात का है कि दुर्ग के रास्ते मुंबई पहुंचा 50 लाख का यह इन्वेस्टमेंट साहब को उस महकमे की गद्दी पर कब तक विराजमान करवाता है।
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एक करोड़ रुपया
वैसे बोली भी लगी तो सिर्फ 50 लाख की। बहुत ही लिजलिजा किस्म की बोली है ये तो। मंत्रालय की गलियों की एक चर्चा में यह बात बाहर आई कि हाल ही में एक महकमे में जब अफसरों को इधर-उधर करने का बंदोबस्त चल रहा था तब एक निश्चित रकम तय कर दी गई थी। ठीक जगह के लिए कम से कम एक करोड़ रुपया और ठीक-ठाक जगह के लिए उससे भी ज्यादा। इधर एक छोटे सी पोस्टिंग के लिए कहां 50 लाख रुपयों की डिलीवरी मुंबई में कराई जा रही है। बेहद शर्म की बात है ये। रकम की भी एक डिग्निटी होनी चाहिए। सुनने में यह चिरकुट टाइप नहीं लगना चाहिए। खैर निश्चित रकम तय करने वाले महकमे का हाल सुन लीजिए। इस महकमे में कुछ ने कुछ से बेहतर चाहा और कुछ ऐसे थे, जो यह उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें कुछ ही मिल जाए तो जीवन में सरकारी नौकरी का असली सुख मिल पाएगा। इस महकमे में लंबे समय से बाबूगिरी में डंप कर दिए गए एक बड़े साहब ने हाथ पैर मारना शुरू किया था। यह बात समझते उन्हें देर नहीं लगी कि उनकी दाल यहां गलने वाली नहीं है। बंगले ने जितना मांगा था, उतनी उनकी हैसियत नहीं थी। सो उन्होंने बंगले की ओर झांकना बंद कर दिया। मायूसी भरे लहजे में एक दफे उन्होने अपने एक करीबी साथी से कहा कि अच्छा होता कि किसी कारपोरेट नौकरी में चला जाता। इतनी कठिन यूपीएससी परीक्षा पास इसलिए की है कि बाबूगिरी करनी पड़े। ढंग की फील्ड पोस्टिंग तक नहीं मिल रही। बंगला जेब झांकने कहता है। अरे यह भी कोई बात है जेब भरी ही नहीं है क्या खाक जेब की ओर झांकूगा मै। साथी ने यूं ही पूछ लिया कि कितनी रकम मांगी गई थी। उदास चेहरा लिए अफसर ने कहा- जंगलराज चल रहा है भाई। मांगा भी गया तो एक करोड़ रुपया।
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इन्वेस्टमेंट बैंकर
एक उच्च पदस्थ अफसर ने समझाया कि अर्थशास्त्र का एक सीधा सा नियम है- जितना बड़ा निवेश, उतना ही आक्रामक रिटर्न। जब एक होनहार अफसर यूपीएससी की भट्टी में तपकर, रातों की नींदें स्वाहा करके सिस्टम में आता है, तो उसे लगता है कि वह देश बदलेगा, लेकिन जब बंगले से एक करोड़ रुपए तक का रेट कार्ड थमा दिया जाता है, तो रातों रात वह इन्वेस्टमेंट बैंकर बन जाता है। एक करोड़ रुपये देकर खरीदी गई ढंग की फील्ड पोस्टिंग कोई चैरिटी तो है नहीं। यह बाकायदा एक स्टार्टअप है, जिसका ब्रेक ईवन पॉइंट अफसर को अपना कार्यकाल खत्म होने से बहुत पहले हासिल करना होता है। अब सोचिए जो अफसर एक करोड़ की भारी भरकम रकम चुकाकर कुर्सी पर बैठेगा, वह वसूली के क्या-क्या अभिनव प्रयोग करेगा? दस्तखत के लिए भी इंक का चार्ज लगने लगेगा। नीली स्याही से धीरे-धीरे काम करवाने के लिए नॉर्मल रेट और अगर फाइल को अर्जेंट बताकर लाल स्याही से मार्क कराना है, तो प्रीमियम तत्काल चार्ज। वसूली का यह महा अभियान केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा। ठेकेदारों के साथ बाकायदा जॉइंट वेंचर चलेगा। गरीबी उन्मूलन तक की योजनाएं अफसर के लिए पर्सनल म्यूचुअल फंड बन जाएंगी, जहां सिस्टम जोखिमों के अधीन सारा पैसा सीधे साहब के बेनामी खातों में डाइवर्ट होगा। दफ्तर के बाहर खड़े फरियादियों की कतार को भी एक सॉलिड बिजनेस मॉडल में बदल दिया जाएगा। साहब से मिलने के लिए वीआईपी दर्शन की तर्ज पर फास्ट ट्रैक टिकट लगेगी। जो एक करोड़ का निवेश किया गया है, उसकी भरपाई के लिए सिर्फ साधारण भ्रष्टाचार से काम नहीं चलेगा, बल्कि इनोवेटिव एक्सटॉर्शन की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में अफसर का ध्यान जिले के सुशासन पर नहीं होगा, बल्कि अपनी बैलेंस शीट का प्रॉफिट मार्जिन सेट करने पर होगा। और जब सब कुछ हो जाएगा, तो वह अफसर गर्व से अपने उस साथी से कह सकेगा कि उसने सिर्फ यूपीएससी ही पास नहीं की है, बल्कि वसूली मैनेजमेंट में भी अपना लोहा मनवाया है। आखिर एक करोड़ की रकम की अपनी एक डिग्निटी होती है, उसे वसूलने का तरीका भी तो कॉरपोरेट लेवल का होना चाहिए, चिरकुटों की तरह पचास लाख में थोड़े ही निपटना है!
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सख्त हेडमास्टर
सूबे की सियासत में जब भी दिल्ली से कोई नया खेवनहार राज्य के दौरे पर आता है, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं में एक अलग ही दीवाली मनने लगती है, लेकिन क्या हो जब नया बॉस स्कूल के उस सख्त हेडमास्टर के अवतार में प्रकट हो जाए, जिसका इकलौता मकसद यह साबित करना हो कि सब के सब नालायक हैं? पिछले दिनों सूबे में ठीक ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां उत्साह का गुब्बारा अहंकार की सूई से पहली ही मुलाकात में फोड़ दिया गया। शुरुआत हवाई अड्डे से ही हो गई थी। स्वागत में खड़े एक उत्साही कार्यकर्ता ने ज्यों ही मुस्कुरा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही, उसे वहीं ऐसा मौखिक प्रसाद मिला कि उसके जो दांत बाहर निकले थे, वे वापस होठों के पीछे ऐसे छिपे कि फिर बैठक खत्म होने तक बाहर नहीं आए। बैठकों का दौर शुरू हुआ तो क्लासरूम की सख्ती और बढ़ गई। एक आदिवासी महिला नेता उस वक्त रडार पर आ गई, जब उनसे एक दूसरे राज्य के एक बड़े नेता के साथ काम करने का अनुभव पूछा गया। महिला नेता ने यह कहा था कि उन्होंने उस नेता के साथ प्रवास किया है। हेडमास्टर यह सुनते ही भड़क गई और उनकी तनी हुई भौंहे देखकर हर कोई सन्न रह गया। दिल्ली से आईं मोहतरमा ने आंखें चढ़ाकर आदिवासी महिला नेता से दो टूक कर दिया कि तुम्हें प्रवास करने और काम करने का अंतर समझ आता भी है या नहीं? साथ ही मुफ्त की सलाह दे डाली कि तुम्हें चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए। बेचारी आदिवासी नेता ने इस अचानक हुए हमले को छिपाने के लिए झेंपते हुए हंसने की कोशिश की, तो हंसना मना है का बोर्ड दिखा दिया गया और उन्हें फौरन शर्म करने की हिदायत दे दी गई। बगल में बैठे एक और भाईसाहब की हंसी छूट गई, तो हेडमास्टर का डंडा चला और उन्होंने पूछा कि तुम्हें बड़ी हंसी आ रही है? बात आगे बढ़ी एक पूर्व विधायक रडार पर तब आ गई, जब उनसे प्रभार जिलों में प्रवास की जानकारी पूछी गई। पूर्व विधायक बोंली कि वह प्रवास करती है, तो फौरन हेडमास्टर ने अपने पीए से कहा, जरा देखों इनका रिकार्ड। कितना झूठ है और कितना सही? सख्ती का आलम यह था कि स्थानीय नेताओं का कच्चा चिट्ठा निकालने का फरमान अपने पीए को सरेआम मंच से ही देती दिखीं। बैठके में मौजूद आला नेता यह तक कहते हैं कि एक दौर ऐसा भी आया कि दिल्ली से पधारीं बॉस का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने भरी बैठक में अपने यहां आने को ही अपना दुर्भाग्य करार दे दिया। उनका सबसे बड़ा दुख यह था कि वह दिल्ली जाकर क्या मुंह दिखाएंगी?
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मायूस कार्यकर्ता
हाईप्रोफाइल बैठकों के बाद एक वरिष्ठ नेता की टिप्पणी काबिलेगौर है। उन्होंने कहा कि राजनीति में सत्ता का अहंकार जब सिर चढ़कर बोलता है, तो वह सबसे पहले उन कार्यकर्ताओं को कुचलता है जिसे हर मंच से पार्टी की रीढ़ बताया जाता है। दिल्ली से पधारीं बॉस का दौरा इसी कड़वी सच्चाई का जीवंत मंचन था। जहां बार-बार यह दिखाया और जताया जा रहा था कि स्थानीय कार्यकर्ता कितने नकारा हैं। जो लोग सुबह से नए बॉस के आने की खुशी में लड्डू बांटने की सोच रहे थे, वे शाम तक अपना-अपना बीपी चेक करवा रहे थे। नेता जी ने कहा, सियासत में कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने में बरसो लगते हैं, लेकिन उन्हें यह अहसास कराने में कि वे कुछ भी नहीं है, बस एक बैठक ही काफी होती है। जो कार्यकर्ता सुबह सम्मान और नई ऊर्जा की उम्मीद लिए पहुंचे थे, उन्हें महज चंद घंटों में उनकी असली औकात बता दी गई। सियासत की यही सबसे स्याह विडंबना है, जिनके पसीने पर सत्ता की भव्य इमारतें खड़ी होती हैं, उन्हें उसी इमारत के भीतर चुल्लू भर पानी में डूब मरने का रास्ता दिखा दिया जाता है।
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