प्रवीण भारद्वाज, पानीपत। जिले के बबैल गांव स्थित प्रसिद्ध श्री बालाजी मंदिर में चोरों ने रात के अंधेरे में दानपात्र पर हाथ साफ कर दिया। मंदिर में करीब एक साल से श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई जा रही नकदी दानपात्र में जमा थी। चोरों ने ताला तोड़कर पूरी रकम निकाल ली और मौके से फरार हो गए। घटना सामने आने के बाद ग्रामीणों में काफी रोष है।

बताया गया कि रविवार रात करीब 8 बजे मंदिर के पुजारी ईश्वर भगत रोजाना की तरह ज्योत जलाने और अन्य धार्मिक कार्य पूरे करने के बाद खाना खाने के लिए गांव स्थित अपने घर चले गए थे। इसी दौरान चोर मंदिर परिसर में दाखिल हुए और दानपात्र को निशाना बनाया।

चोरों ने दानपात्र का ताला और कुंडा तोड़ने के लिए मंदिर की रसोई में रखा लोहे का हलवा बनाने वाला पलटा इस्तेमाल किया। इसी पलटे से दानपात्र को क्षतिग्रस्त करने के बाद उसमें जमा नकदी निकाल ली गई। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी इस्तेमाल किया गया पलटा वहीं छोड़कर निकल गए।

मंदिर के पुजारी के मुताबिक दानपात्र को आमतौर पर साल में एक बार खोला जाता है। इसमें करीब एक वर्ष से श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई राशि जमा थी। हर साल दानपात्र से लगभग एक लाख रुपये का चढ़ावा निकलने की बात कही गई है। इस बार भी दानपात्र को करीब 10 दिन बाद खोला जाना था, लेकिन उससे पहले ही चोर पूरी रकम ले गए।

खाना खाने के बाद जब पुजारी वापस मंदिर पहुंचे तो दानपात्र की हालत देखकर उनके होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत ग्रामीणों को सूचना दी और पुलिस को भी घटना की जानकारी दी। कुछ ही देर में पुलिस टीम मौके पर पहुंची और मंदिर परिसर का निरीक्षण कर जरूरी साक्ष्य जुटाए।

पुलिस अब आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल रही है, ताकि वारदात को अंजाम देने वाले आरोपियों की पहचान हो सके। वहीं, गांव के प्रमुख धार्मिक स्थल में चोरी होने से ग्रामीणों में नाराजगी है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और आरोपियों तक पहुंचने के लिए उपलब्ध सुरागों को खंगाला जा रहा है।

साल में एक बार खुलता था दानपात्र, 10 दिन बाद ही खोलना था

मंदिर के पुजारी ईश्वर भगत ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि यह मंदिर वर्ष 2010 से गांव में स्थापित है और स्थानीय ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। श्रद्धालु रोजाना यहां भारी मात्रा में चढ़ावा चढ़ाते हैं। पुजारी के अनुसार, हर साल दानपात्र से करीब 1 लाख रुपए का दान निकलता है, जिसका इस्तेमाल मंदिर के रखरखाव और निर्माण कार्यों में किया जाता है। दानपात्र में करीब एक साल से राशि जमा हो रही थी और महज 10 दिन बाद (करीब एक साल पूरा होने पर) इसे खोला जाना तय हुआ था.