पटना। बिहार के सबसे बड़े अस्पतालों में शुमार पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) एक बार फिर अपनी व्यवस्था और संवेदनशीलता को लेकर चर्चा के केंद्र में है। बुधवार को अस्पताल परिसर में कैंटीन के पीछे टीएन बनर्जी घाट के पास एक नवजात का क्षत-विक्षत शव मिलने से हड़कंप मच गया। स्थिति इतनी भयावह थी कि आवारा कुत्ते शव के बड़े हिस्से को नोंच चुके थे, और मौके पर केवल सिर व शरीर का कुछ ऊपरी हिस्सा ही बचा हुआ था।
​जब कुछ डॉक्टरों की नजर इस अमानवीय दृश्य पर पड़ी, तो उन्होंने तुरंत अस्पताल प्रशासन को इसकी सूचना दी। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह ने कहा कि कई बार लोग नवजात की मौत के बाद शवों को इधर-उधर छोड़ कर चले जाते हैं, जिसके बाद जानवर ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। हालांकि, इस सफाई के बाद भी अस्पताल में मृत नवजातों के शवों की सुरक्षित देखरेख और उनके मानवीय निस्तारण की व्यवस्था पर भारी सवाल खड़े हो गए हैं।

​इतिहास खुद को दोहरा रहा है

​यह कोई पहली बार नहीं है जब पीएमसीएच की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हों। इससे पहले मार्च 2014 में भी एक कुत्ता मृत नवजात के शव को मुंह में दबाकर अस्पताल परिसर में घूमता हुआ पाया गया था। उस समय भी प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था सख्त करने और गार्डों को कड़ी चेतावनी देने के निर्देश दिए थे। लेकिन, करीब 12 साल बाद दोबारा ऐसी घटना सामने आने से यह साफ हो गया है कि पूर्व में किए गए इंतजाम केवल कागजी और बेअसर साबित हुए हैं।
​राज्य के अन्य बड़े अस्पतालों का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा है। जनवरी 2024 में मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में भी कुत्ते द्वारा नवजात के शव को नोचे जाने का मामला सामने आया था। इसके अलावा, नवंबर 2025 में भी अस्पताल के पास कुत्ते के मुंह में नवजात का शव देखे जाने की खौफनाक रिपोर्ट्स सामने आई थीं। हालांकि, इन सभी मामलों में हमेशा उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस और स्थायी समाधान नजर नहीं आता है।

​जिम्मेदारी तय होना बेहद जरूरी

​लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले समाजसेवी विजय कुमार का कहना है कि इस तरह की अमानवीय घटनाओं को रोकने के लिए अस्पतालों में नवजात शवों के निस्तारण की पुख्ता और पारदर्शी व्यवस्था होना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि शवों को सुरक्षित रखने, उन्हें सौंपने और अंतिम संस्कार करने तक की पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। केवल निचले स्तर के सफाईकर्मियों पर कार्रवाई कर देने से इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।

​एक तरफ लाचारी, दूसरी तरफ ममता की छांव

​इस दर्दनाक घटना के बीच पीएमसीएच से एक मानवीय और दिल को छू लेने वाली खबर भी सामने आई है। जिस मां ने नौ महीने तक अपने गर्भ में बच्ची को पाला, वही जन्म के बाद उसे अपनी ममता नहीं दे सकी और जन्म के करीब 24 घंटे बाद पीएमसीएच की सीढ़ी के पास लावारिस छोड़ कर चली गई।
​कपड़े में लिपटी हुई नवजात जब घंटों अकेली पड़ी रही, तो उसके रोने की आवाज सुनकर अस्पतालकर्मियों को उसकी मौजूदगी का पता चला। बिना देर किए बच्ची को तत्काल शिशु रोग विभाग में भर्ती कराया गया। पिछले करीब 12 दिनों से पांच नर्सों की एक समर्पित टीम ही इस लावारिस बच्ची का पूरा परिवार बनकर उसकी हर जरूरत का ख्याल रख रही है। पीएमसीएच अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह ने इस संबंध में जानकारी दी है कि यदि परिजनों का कोई सुराग नहीं मिलता है, तो नियमानुसार इस बच्ची को आधिकारिक तौर पर दत्तक ग्रहण केंद्र (असाइनमेंट सेंटर) भेजने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू की जाएगी।