जहां अब दूषित नालों का पानी, प्लास्टिक कचरा, शराब की बोतलें और चारों ओर फैली गंदगी ही गंदगी

नदी यात्रा से लौटकर वैभव बेमेतरिहा की रिपोर्ट-

रायपुर। खारुन करुण कथा की दूसरी कड़ी उस पीड़ा की कहानी है, जिसमें एक जीवदायिनी और विशाल नदी धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोते हुए तालाब में तब्दील होती दिखाई देती है। यह वह सच है, जिससे न सरकार अनजान है और न ही समाज। सच तो यह है कि खारुन की इस दुर्दशा के लिए हम सब कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं।

आखिर एक नदी, जो कभी सभ्यता और व्यापार का आधार रही हो, वह आज गंदे और ठहरे हुए जलाशय में कैसे बदल गई? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए तरीघाट से महादेव घाट तक लगभग 30 किलोमीटर की नदी यात्रा की गई।

श्रृंखला की पहली कड़ी में खारुन के किनारों पर हो रहे खनन और अतिक्रमण की पड़ताल की गई थी। दूसरी कड़ी में कहानी उस बड़े कारण की, जिसने खारुन के प्राकृतिक प्रवाह को लगभग खत्म कर दिया है— एक के बाद एक बनाए गए एनीकेट।

खारुन नदी के किनारे बसा तरीघाट करीब 2400 वर्ष पुराना ऐतिहासिक नगर है। यहां से मौर्य और गुप्त काल के पुरावशेष मिले हैं। इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र कभी व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा, जहाँ नदी मार्ग का व्यापक उपयोग होता था। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि हजारों वर्ष पहले खारुन का स्वरूप कितना विशाल और जीवनदायिनी रहा होगा।

लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल अलग है

खारुन की बर्बादी में यदि खनन और अतिक्रमण के बाद कोई सबसे बड़ा कारण दिखाई देता है, तो वह है अत्यधिक संख्या में एनीकेटों का निर्माण। कम दूरी में एक के बाद एक बनाए गए एनीकेटों ने नदी के स्वाभाविक बहाव को रोक दिया है। परिणामस्वरूप, खारुन जैसी विशाल नदी कई स्थानों पर दूषित तालाब में बदल गई है।

बरसात के कुछ महीने बाद खारुन को देखना किसी प्रदूषित जलाशय को देखने जैसा लगता है

बालोद जिले के पेटेचुवा से निकलने वाली खारुन लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा तय कर सिमगा के समीप सोमनाथ में शिवनाथ नदी से मिलती है। इस पूरे मार्ग में पानी रोकने और संग्रहित करने के उद्देश्य से अनेक एनीकेट बनाए गए हैं। इससे एक ओर जल भंडारण बढ़ा, लेकिन दूसरी ओर नदी की सेहत पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़े हैं।

तरीघाट से महादेव घाट तक की यात्रा में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जगह-जगह पानी रोके जाने से नदी अपना मूल स्वरूप खो चुकी है। साथ ही समाज ने भी इसे प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

करीब 30 किलोमीटर के इस हिस्से में तरीघाट, लमकेनी, ढोंढरा (निर्माणाधीन), टोलाघाट, आमदी, मुंडरा-जमराव, दतरेंगा-काठाडीह, खुड़मुड़ा, रायपुरा और महादेव घाट में एनीकेट बनाए गए हैं। यानी औसतन हर तीन किलोमीटर पर एक एनीकेट।

तरीघाट एनीकेट के ऊपर पानी भरपूर दिखाई देता है, लेकिन नीचे नदी पतली धार में सिमट जाती है। लमकेनी पहुँचते-पहुँचते पानी फिर रुक जाता है। ढोंढरा में नया एनीकेट लगभग तैयार है। ढोंढरा से आगे खट्टी-टोलाघाट के बीच नदी कई छोटी धाराओं में बंटती दिखाई देती है। बीच के हिस्सों में पानी कम होने से छोटे-छोटे टापू बन गए हैं।

टोलाघाट के पास फिर पानी का जमाव दिखता है, लेकिन इसके नीचे बहाव कमजोर पड़ जाता है। आमदी पहुंचते-पहुंचते पानी फिर थम जाता है। इसके बाद मुंडरा-जमराव, दतरेंगा-काठाडीह, खुड़मुड़ा, रायपुरा और महादेव घाट तक यही क्रम जारी रहता है।

नतीजा यह है कि खारुन अब नदी कम और तालाब ज्यादा दिखाई देती है। जैसे किसी निश्चित दायरे में तालाब का पानी ठहरा रहता है, वैसे ही खारुन में भी एक निश्चित दूरी तक पानी जमा दिखाई देता है।

भीषण गर्मी के दौरान वर्तमान में गंगरेल बांध से पानी छोड़ा गया है, जिससे नदी में जल उपलब्ध है। लेकिन जब डैम से पानी नहीं छोड़ा जाता, तब खारुन कई स्थानों पर पूरी तरह सूख जाती है।

खारुन का सबसे दूषित रूप खुड़मुड़ा से दिखाई देना शुरू होता है। यहां नदी किनारे प्लास्टिक कचरे के बड़े ढेर, शराब की खाली बोतलें, डिस्पोजल सामग्री, पानी के पाउच, पत्तल और खाद्य पदार्थों के रैपर बिखरे पड़े मिले। नदी के भीतर और किनारों पर जलकुंभी का व्यापक फैलाव भी दिखाई देता है।

खुड़मुड़ा से आगे रायपुरा एनीकेट तक प्रदूषण और बढ़ जाता है। रायपुरा से महादेव घाट के बीच खारुन की सबसे भयावह तस्वीर सामने आती है। कई नालों का दूषित पानी बिना किसी शोधन के सीधे नदी में मिल रहा है। बड़े पैमाने पर प्लास्टिक कचरा भी नदी में बहकर पहुंच रहा है। यहां खारुन का पानी अपना प्राकृतिक रंग खोकर काला पड़ने लगता है।

नदी के दोनों किनारों पर घाटों और पचरियों के आसपास कचरे के ढेर जमा हो चुके हैं। एनीकेटों के समीप स्थिर जल में यह गंदगी और अधिक भयावह दिखाई देती है।

बरसात से पहले हर वर्ष निगम प्रशासन खारुन की सफाई कराता है। वर्तमान में भी वार्षिक सफाई अभियान जारी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सफाई अभियान नदी को बचा सकता है?

वास्तविकता यह है कि जब तक नदी का प्राकृतिक प्रवाह बहाल नहीं होगा, तब तक खारुन को स्वच्छ बनाए रखना संभव नहीं होगा। महीनों की सफाई के बाद भी गंदगी लौट आती है, क्योंकि नदी का बहाव बाधित हो चुका है।

जल संरक्षण विशेषज्ञों का भी मानना है कि नदियों पर अवैज्ञानिक तरीके से अत्यधिक एनीकेटों का निर्माण उनकी सेहत के लिए घातक है। प्रख्यात जलविद् राजेन्द्र सिंह का कहना है कि नदियों पर अनावश्यक चेक डैम और एनीकेटों का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।

खारुन के उद्गम स्थल पेटेचुवा से लेकर शिवनाथ संगम स्थल सोमनाथ तक की यात्रा कर चुके पर्यावरण प्रेमी पत्रकार रोमशंकर यादव का भी यही मत है। उनका कहना है कि खारुन के प्राकृतिक बहाव को नष्ट किया जा रहा है। नदी का स्वभाव नीचे की ओर बहना है, लेकिन अब बहाव वाले हिस्सों में गाद जमा हो रही है। यदि यह क्रम जारी रहा तो नदी धीरे-धीरे मर जाएगी। आज खारुन में पानी इसलिए दिखाई देता है क्योंकि डैम से पानी छोड़ा जाता है। खारुन को बचाने के लिए सरकार से कहीं अधिक समाज को जागरूक होना पड़ेगा।

नदियों पर आधारित विभिन्न शोध रिपोर्टों के अनुसार अत्यधिक एनीकेट निर्माण के दुष्परिणाम गंभीर हैं। इससे भूजल संतुलन प्रभावित होता है, एनीकेट के निचले हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनने लगती है, नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता है, पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ता है, जैव विविधता प्रभावित होती है और रुके हुए पानी में जलकुंभी के साथ प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। ऐसे जल में दुर्गंध और विषाक्तता का खतरा भी बढ़ जाता है।

खारुन को बचाने की लड़ाई केवल सरकारी योजनाओं और सफाई अभियानों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए समाज को भी यह समझना होगा कि नदी कोई जलाशय नहीं, बल्कि एक जीवंत और सतत बहने वाली प्राकृतिक धारा है। उसका अस्तित्व उसके प्रवाह में है। यदि प्रवाह ही खत्म हो गया, तो खारुन का इतिहास तो बचेगा, लेकिन भविष्य नहीं।

(खारुन करुण कथा की अगली कड़ी में पढ़िए— सरकारी परियोजनाओं, करोड़ों के खर्च और व्यवस्था की पड़ताल।)

Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H