फरीदाबाद। कभी बिहार और झारखंड में चार स्कूल चलाने वाले और लाखों रुपये की आमदनी करने वाले 64 वर्षीय रामचंद्र पांडे आज फरीदाबाद के सेक्टर-10 स्थित वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। जिंदगी में सब कुछ अपने दम पर खड़ा करने वाले रामचंद्र के पास आज रहने के लिए छत और खाने की व्यवस्था तो है, लेकिन अपनों का साथ नहीं है। पत्नी से विवाद, एक गंभीर हादसा और परिवार से बढ़ती दूरी ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

रामचंद्र मूल रूप से बिहार के रोहतास जिले के सासाराम के रहने वाले हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2015 से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। फरीदाबाद आने से पहले वह कुरुक्षेत्र के एक वृद्धाश्रम में रहे। उनका कहना है कि कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि जिंदगी के इस पड़ाव पर उन्हें किसी सहारे की जरूरत पड़ेगी।
कभी चार स्कूलों की जिम्मेदारी संभालते थे

रामचंद्र बताते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी की शुरुआत बेहद साधारण तरीके से की। पहले आठवीं कक्षा तक का स्कूल शुरू किया और बाद में उसे दसवीं तक किया। धीरे-धीरे बिहार और झारखंड में उनके चार स्कूल संचालित होने लगे।

स्कूलों में शिक्षक और दूसरे कर्मचारियों को रोजगार दिया। लाखों रुपये की आमदनी होने लगी। बाद में उन्होंने स्कूल बेच दिए। उनके मुताबिक, आज भी वह स्कूल चल रहे हैं, लेकिन उनका उनसे कोई संबंध नहीं है।

पत्नी से विवाद के बाद परिवार से बढ़ती गई दूरी

रामचंद्र के अनुसार, वर्ष 2012 से पत्नी के साथ विवाद शुरू हुआ। वर्ष 2013 में उनका गंभीर एक्सीडेंट हो गया और वह करीब छह महीने तक कोमा में रहे। जब उन्हें होश आया तो जिंदगी पहले जैसी नहीं रही थी।

वह बताते हैं कि पारिवारिक विवाद बढ़ता गया और वर्ष 2015 में उन्हें घर से बाहर होना पड़ा। इसके बाद उनकी पत्नी की ओर से उनके खिलाफ केस भी हुआ, जो वर्ष 2018 में खत्म हुआ। इसके बाद परिवार से उनका संपर्क लगातार कम होता चला गया।

रामचंद्र की दो बेटियां हैं और दोनों की शादी हो चुकी है। उनका दावा है कि उन्हें बेटियों की शादी में भी शामिल नहीं किया गया। पहली बेटी की शादी के बाद उसके तलाक की जानकारी भी उन्हें दूसरों से मिली।

पढ़ाई और कविता आज भी बनी सहारा

रामचंद्र पांडे हिंदी से एमए और बीएड कर चुके हैं। पढ़ाई के प्रति उनका लगाव आज भी कायम है। उन्हें कविता लिखने का शौक है और वृद्धाश्रम में रहते हुए उन्होंने इस पर भी कविता लिखी है।

वह कहते हैं कि जिंदगी में पैसा, पहचान और कामयाबी हासिल करने के बावजूद अगर अपने साथ न हों तो इंसान के पास बहुत कुछ होते हुए भी एक कमी बनी रहती है।

हालांकि, रामचंद्र वृद्धाश्रम की व्यवस्था से संतुष्ट हैं। उनका कहना है कि यहां उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं है और उनकी अच्छी देखभाल होती है।

छत मिल गई, लेकिन अपनों का इंतजार बाकी

रामचंद्र की कहानी केवल एक बुजुर्ग के वृद्धाश्रम में रहने की कहानी नहीं है। यह उस बदलते पारिवारिक रिश्ते की तस्वीर भी है, जिसमें कभी अपने पैरों पर खड़े होकर दूसरों को रोजगार देने वाला व्यक्ति आज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर दूसरों की व्यवस्था के सहारे रह रहा है। फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में रामचंद्र को रहने के लिए सुरक्षित जगह, भोजन और देखभाल मिल रही है। लेकिन जिस अपनत्व और परिवार के साथ की उन्हें तलाश है, उसकी कमी आज भी बनी हुई है।

हाल ही में सोनीपत के 74 वर्षीय शिवचरण रामरतन गुप्ता की कहानी सामने आने के बाद बुजुर्गों और परिवारों के बीच बढ़ती दूरी पर सवाल उठे थे। रामचंद्र पांडे की कहानी भी वही सवाल दोहराती है—क्या उम्र के उस पड़ाव पर, जब इंसान को सबसे ज्यादा अपनों की जरूरत होती है, तब रिश्तों की दूरी इतनी बढ़ जानी चाहिए कि घर की जगह वृद्धाश्रम ही आखिरी सहारा बन जाए?

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