Odisha Desk, पुरी: आषाढ़ की रिमझिम फुहारें बरस रही हैं, आसमान में सघन काले मेघ अठखेलियाँ कर रहे हैं, लेकिन महाप्रभु श्री जगन्नाथ की नगरी पुरी में आस्था का ज्वार चरम पर है। कड़ाके की बारिश भी भक्तों के कदम पीछे नहीं डिगा पाई है, बल्कि इस बारिश ने बड़ दांड (Grand Road) के आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक भावुक व अलौकिक बना दिया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो स्वयं इंद्रदेव और काले मेघ भी महाप्रभु के इस पतितपावन रूप के दर्शन के लिए व्याकुल होकर आकाश से धरती पर उतर आए हैं। भक्त, भगवान और प्रकृति का यह अपूर्व संगम रथ यात्रा की महिमा को अद्वितीय बना रहा है।

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं ने बड़ा दांड का साथ नहीं छोड़ा है। कोई हाथों में छाता थामे है, कोई रेनकोट पहने है, तो कोई प्रकृति के इस बर बरसते पानी की परवाह किए बिना खुले आसमान के नीचे पूरी तरह भीगते हुए अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए खड़ा है। सभी की आँखें केवल एक ही दिशा में टिकी हैं अपने प्राणप्रिय जगन्नाथ जी के दर्शन पर।

इस बीच, शंख, घंटे, झांझ, मृदंग और काहाली की दिव्य ध्वनियों के साथ आकाश-पाताल ‘जय जगन्नाथ’ के नारों से गूंज उठा है। बारिश के पानी के साथ भक्तों की आँखों से बहते आंसुओं की बूंदें मिलकर एक ऐसी अद्भुत रसधारा बहा रही हैं, जिसे देख हर कोई निशब्द है।

वर्तमान में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों पर विराजमान हो चुके हैं। मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सभी महत्वपूर्ण नीतियां और अनुष्ठान संपन्न किए जा रहे हैं, जिसके तुरंत बाद बहुप्रतीक्षित रथ खींचने (रथयात्रा) का कार्य प्रारंभ होगा। इस ऐतिहासिक और अलौकिक क्षण के साक्षी बनने के लिए लाखों भक्त धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

आज के इस पावन दिन पर भक्तों के पास प्रभु को अर्पित करने के लिए न तो कोई धन-दौलत है और न ही कोई बहुमूल्य उपहार। वे बस अपनी नम आँखों से जगन्नाथ के ‘काले नयन’ से अपने नयन मिलाकर मन के सारे दुख, दर्द, अभिमान और प्रार्थनाएं उनके श्रीचरणों में समर्पित कर देना चाहते हैं। यही तो जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी महिमा है, जहां न तो बारिश भक्ति को रोक सकती है और न ही भीषण भीड़ दर्शन में बाधा बन सकती है; क्योंकि भक्त और भगवान के बीच का यह प्रेम संबंध अनंत, अटूट और अनुपम है।

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