Sawan Special 2026: हिंदू कैलेंडर वर्ष का सबसे पवित्र महीना सावन (श्रावण) की शुरुआत आज से हो गई है। पावन सावन का महीना देवों के देव महादेव की आराधना करने का सबसे पवित्र समय माना जाता है। सावन में लाखों भक्त देश के कोने-कोने में स्थित शिव मंदिरों (Shiva temples) के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। भारत में 12 ज्योतिर्लिंग समेत भारत के कई प्रमुख मंदिर है। ये मंदिर अपने स्थापत्य कला (डिजाइन और निर्माण की कला, विज्ञान तथा तकनीक) को लेकर लोगों के बीच हमेशा से चर्चाओं के केंद्र में रहा है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैले ये प्राचीन शिव मंदिर केवल आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, खगोलशास्त्र और वास्तुकला की एक ऐसी अजूबा मिसाल हैं। इसे देखकर आज का आधुनिक विज्ञान भी हैरान रह जाता है। इन्हीं अजूबों में हैं एक ही लाइन (शिव शक्ति अक्ष रेखा) में बनें हुए भगवान शिव (Lord Shiva) के 7 प्रमुख मंदिर।

बड़ा सवाल उठता है कि आखिर ये मंदिर एक ही सीधी रेखा, यानी लगभग 79° पूर्व देशांतर (East Longitude) पर कैसे बनाए गए? शिव शक्ति अक्ष पर स्थित इन 7 दिव्य मंदिरों और उज्जैन के खगोलीय महत्व का पूरा रहस्य यहां समझते हैंः-

उत्तराखंड का केदारनाथ मंदिर से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम मंदिर तक 7 प्रसिद्ध शिव मंदिर लगभग एक सीधी रेखा में स्थित हैं। इस रेखा को कुछ लोग शिव शक्ति अक्ष रेखा (Shiva Shakti Aksh Rekha) के नाम से भी जानते हैं। इस रेखा पर शामिल प्रमुख मंदिरों में केदारनाथ, अरुणाचलेश्वर, थिल्लई नटराज, जम्बूकेश्वर, एकाम्बेश्वरनाथ, श्रीकालाहस्ती और अंत में रामेश्वरम है। इन मंदिरों को पंचतत्व से भी जोड़ा जाता है। श्रीकालाहस्ती को वायु तत्व, एकाम्बेश्वर को पृथ्वी, जम्बूकेश्वर को जल, अरुणाचलेश्वर को अग्नि और थिल्लई नटराज को आकाश का प्रतीक माना जाता है

ये सभी मंदिर लगभग 79 डिग्री पूर्व देशांतर के आसपास एक सीध में बनाए गए हैं। सबसे दिलचस्प बात यह मानी जाती है कि इनका निर्माण हजारों साल पहले हुआ, जब आज की तरह आधुनिक तकनीक या सैटेलाइट सिस्टम उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद, प्राचीन समय में इतनी सटीक दिशा और स्थान का चुनाव किया गया, जिससे यह धारणा और भी रहस्यमय लगती है।

सात मंदिर एक ही रेखा बनें ये सात प्रमुख मंदिर

1. केदारनाथ (79.0669° E)

उत्तराखंड के हिमालय में स्थित यह पवित्र धाम है। मान्यता है कि पांडवों ने इसका निर्माण कराया और बाद में आदि शंकराचार्य ने पुनर्स्थापना की थी।

2. श्रीकालाहस्ती (79.6983° E)

आंध्र प्रदेश में स्थित यह मंदिर वायु तत्व का प्रतीक माना जाता है। राहु-केतु दोष के लिए प्रसिद्ध है।

3. एकाम्बरेश्वर (79.42° E)

तमिलनाडु का यह मंदिर पृथ्वी तत्व से जुड़ा है। इसका निर्माण प्राचीन राजाओं द्वारा किया गया था।

4. अरुणाचलेश्वर (79.0677° E)

यह मंदिर अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। तिरुवन्नामलाई में स्थित है।

5. जम्बूकेश्वर (लगभग 79.07° E)

यह मंदिर जल तत्व का प्रतीक है। इसकी खास बात है कि गर्भगृह में हमेशा पानी रहता है।

6. थिल्लई नटराज (79.6935° E)

चिदंबरम में स्थित यह मंदिर आकाश तत्व से जुड़ा है। भगवान शिव के नटराज रूप को समर्पित है।

7. रामेश्वरम (79.3129° E)

तमिलनाडु में स्थित यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। भगवान राम ने इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।

भारत का ग्रीनविच है उज्जैन

उज्जैन को भारत का ग्रीनविच भी कहा जाता है, क्योंकि प्राचीन समय में यहां से समय की गणना की जाती थी। आज भले ही दुनिया ग्रीनविच को मानती है, लेकिन उससे बहुत पहले उज्जैन को ही देश का केंद्रीय मेरिडियन माना जाता था। प्राचीन विद्वानों ने अपनी गणनाओं के आधार पर उज्जैन को शून्य रेखांश (Zero Longitude) माना था। इसके साथ ही कर्क रेखा का संबंध भी इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ था, जिससे खगोलीय अध्ययन में मदद मिलती थी। उज्जैन को पृथ्वी और आकाश के बीच संतुलन का केंद्र भी माना जाता था। इसी कारण यहां से समय, ग्रह-नक्षत्र और पंचांग की गणना करना आसान और सटीक समझा जाता था। प्रसिद्ध ग्रीक गणितज्ञ क्लॉडियस टॉलमी ने भी उज्जैन को भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण माना था। ग्रीक लोग उज्जैन को ओजीन नाम से जानते थे।

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