हेमंत शर्मा, इंदौर। जब देशभर के लाखों छात्र नीट धांधली की आग में जल रहे थे, जब भविष्य के डॉक्टरों का सड़कों पर खून-पसीना बह रहा था, तब दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में ‘कुर्सी बचाने’ की गंदी राजनीति चल रही थी! मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने केंद्र सरकार के ‘डैमेज कंट्रोल’ का नकाब पूरी तरह उतार कर फेंक दिया है।

विजयवर्गीय का दावा है कि धर्मेंद्र प्रधान तो आंदोलन के पहले ही दिन इस्तीफा जेब में लेकर घूम रहे थे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष से कहा था— “कहिए तो अभी कुर्सी छोड़ दूं?” लेकिन दिल्ली के आकाओं ने उन्हें रोक दिया। अब सवाल यह उठता है कि अगर धर्मेंद्र प्रधान इतने ही नैतिक थे, तो सरकार इतने दिनों तक किसे बेवकूफ बना रही थी? और अगर पहले दिन इस्तीफा नहीं लिया गया, तो बाद में ऐसा क्या मजबूरी आ गई कि प्रधान को ‘बलि का बकरा’ बनाना पड़ा।

विदेशी साजिश का ‘घिसा-पिटा’ राग या अपनी नाकामी छिपाने का जरिया?

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कैलाश विजयवर्गीय ने ऐसा तर्क दिया जिसे सुनकर कोई भी सिर पकड़ ले। उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देश बचाने वाली ‘मास्टरस्ट्रोक’ क्रांति की तरह पेश कर दिया! विजयवर्गीय ने दावा किया कि भारत में बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी हिंसा फैलाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही थी, जिसे धर्मेंद्र प्रधान के एक इस्तीफे ने अकेले ही विफल कर दिया।

लेकिन सवाल यह है

क्या देश की सुरक्षा व्यवस्था इतनी पंगु हो चुकी थी कि एक शिक्षा मंत्री की कुर्सी गिरते ही ‘विदेशी ताकतें’ भाग खड़ी हुईं? क्या नीट परीक्षा में हुई पेपर लीक और धांधली भी किसी ‘विदेशी एजेंसी’ ने कराई थी?या फिर शिक्षा मंत्रालय की घोर नाकामी को छिपाने के लिए हमेशा की तरह ‘विदेशी साजिश’ की ढाल का इस्तेमाल किया जा रहा है?विजयवर्गीय ने अपने इस सनसनीखेज दावे के समर्थन में न तो कोई सबूत दिया और न ही कोई दस्तावेज पेश किया। कांग्रेस पर तंज, लेकिन अपनी नीयत पर चुप्पी! छात्र आंदोलन पर राजनीति का आरोप लगाते हुए विजयवर्गीय ने कांग्रेस पर भी तीखा हमला बोला।

एक भी कांग्रेसी नेता ने पुलिस की लाठियां खाईं?

उन्होंने तंज कसा कि कांग्रेस की हालत उस पड़ोसी जैसी है, जिसके घर बच्चा होने पर वो खुद ढोल पीटने लगता है। उन्होंने सवाल दागा कि क्या आंदोलन के दौरान एक भी कांग्रेसी नेता ने पुलिस की लाठियां खाईं? बेशक कांग्रेस राजनीति कर रही होगी, लेकिन सवाल तो सत्ता में बैठे लोगों से ही पूछा जाएगा। जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर था, तब बीजेपी आलाकमान इस बात की गणित बिठा रहा था कि इस्तीफा कब लिया जाए ताकि ‘पार्टी की साख’ न गिरे।

इस्तीफा हो गया, पर न्याय का क्या?

कैलाश विजयवर्गीय के इस ‘बड़बोले’ खुलासे ने साफ कर दिया है कि बीजेपी के लिए छात्रों का भविष्य प्राथमिकता नहीं था, बल्कि क्राइसिस मैनेजमेंट और टाइमिंग ज्यादा जरूरी थी। धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी जा चुकी है, राजनीति चरम पर है और बयानों के तीर चल रहे हैं… लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी जस का तस खड़ा है— क्या मंत्री का पद छीन लेने भर से नीट पीड़ित छात्रों को न्याय मिल गया? या फिर यह पूरी कवायद सिर्फ और सिर्फ बीजेपी की साख बचाने की एक नाकाम कोशिश थी?

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