भोपाल। भौगोलिक सीमाओं के अलावा मध्यप्रदेश की पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक परंपराओं और गौरवशाली इतिहास से भी होती है। भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा-दीक्षा से लेकर सुदर्शन धारण करने तक के असंख्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों की उपस्थिति इस प्रदेश को देश के सांस्कृतिक मानचित्र में एक विशिष्ट स्थान बनाती रही है। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में किया जाने वाला ‘श्रीकृष्ण पर्व’ का व्यापक आयोजन मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने और उसे विकास की नई संभावनाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास साबित होने जा रहा है।
घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल’ की संकल्पना के साथ 4 सितंबर को मध्यप्रदेश के सभी 55 जिलों में 111 स्थानों पर होने वाले इस आयोजन से राज्य की संस्कृति, राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित न रह कर गांव-गांव और कस्बे-कस्बे तक पहुंचने में सफल होगी। इस आयोजन को जनभागीदारी का विराट स्वरूप देने के लिए मध्यप्रदेश के 7500 से अधिक श्रीकृष्ण मंदिरों में विशेष साज-सज्जा और 1500 से अधिक स्थानीय कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा हैं।

‘श्रीकृष्ण पर्व’, घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल’का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भगवान श्रीकृष्ण को आस्था के केंद्र के अलावा भारतीय जीवन-दर्शन, ज्ञान, मित्रता, करुणा, कर्तव्य और धर्म के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में सांस्कृतिक प्रयासों को गति दी है। श्रीकृष्ण पाथेय न्यास के द्वारा भगवान कृष्ण की जीवन-यात्रा से जुड़े स्थलों की पहचान, संरक्षण, दस्तावेजीकरण और विकास की व्यापक परिकल्पना से ‘विरासत से विकास’ की सोच को मजबूती मिली है।
मध्यप्रदेश में नारायणा धाम, श्रीकृष्ण की पाठशाला सांदीपनि आश्रम, अमझेरा, जानापाव और जामगढ़ जैसे स्थल श्रीकृष्ण परंपरा के अलग-अलग रंगों में रंगे हुए हैं। उज्जैन का नारायणा धाम श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता और समानता की भावना को जीवंत करता है वहीं सांदीपनि आश्रम गुरु-शिष्य परंपरा और ज्ञान का प्रतीक है। जामगढ़ स्यमंतक मणि और श्रीकृष्ण-जामवंत प्रसंग की लोकमान्यताओं से लबरेज़ है आज और अमझेरा श्रीकृष्ण-रुक्मिणी प्रसंग की स्मृतियों से जुड़ा है। भगवान कृष्ण से जुड़े इन पवित्र स्थलों को जोड़ने वाला एक व्यापक ‘श्रीकृष्ण पथ’ निश्चित रूप से राज्य में धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं को भी विस्तार देने वाला साबित होगा।

मुख्यमंत्री निवास में 101 से अधिक बच्चों को राधा-कृष्ण की वेशभूषा में आमंत्रित कर उन बच्चों को मुख्यमंत्री के द्वारा माखन-मिश्री, लड्डू गोपाल की प्रतिमा और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित पुस्तक भेंट किया जाना इस आयोजन के मानवीय पक्ष को बढ़ावा देने वाला रहा। ऐसा करके प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस बात पर बल दिया है कि संस्कृति मंचीय प्रस्तुति के साथ ही साथ कि संस्कार और अनुभव का हिस्सा भी है। यही वह सार्थक दृष्टिकोण है जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ सकती है।
इस आयोजन की दूसरी बड़ी ख़ासियत में शामिल है स्थानीय कलाकारों को मंच देना। बघेली, बुंदेली और मालवी लोक परंपराओं से लेकर भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, भजन, रासलीला और नृत्य-नाटिकाओं तक का समावेश मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को एक सूत्र में पिरोता है। 1500 से अधिक स्थानीय कलाकारों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन तभी प्रभावी और सम्भव हो सकता है जब स्थानीय प्रतिभाओं को सम्मान और मंच दोनों मिलें।

प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव मध्यप्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को केवल अतीत की स्मृति ही बना कर नही रखना चाहते वे उसे शिक्षा, पर्यटन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। 230 विधानसभाओं में गीता भवन स्थापित करने का बड़ा लक्ष्य, सांदीपनि आश्रम का विकास, अमझेरा में श्रीकृष्ण-रुक्मिणी लोक और लीला गुरुकुल, नारायणा में अंतर्राष्ट्रीय सांदीपनि वैदिक गुरुकुल और जानापाव में परशुराम-श्रीकृष्ण लोक जैसी योजनाएं उनकी व्यापक दृष्टिकोण का प्रमाण दे रही हैं।
सांस्कृतिक पर्यटन केवल मंदिर-दर्शन तक सीमित नहीं होता देखा गया है किसी ऐतिहासिक या पौराणिक स्थल पर संग्रहालय, पुस्तकालय, सूचना केंद्र, डिजिटल अनुभव, सभागार और सुविधाएं विकसित की जाएँ तो वहां पर्यटकों के साथ विद्यार्थी, शोधार्थी और युवा भी पहुंचते हैं। लोगों के आने से स्थानीय परिवहन, हस्तशिल्प, खान-पान, होम-स्टे और छोटे व्यवसायों के लिए अवसर पैदा होते हैं। प्रदेश में नई पीढ़ी को श्रीकृष्ण की कथा और उनसे जुड़े यात्रा स्थलों से भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ पुस्तकालय, संग्रहालय और सूचना केंद्र विकसित करने की परिकल्पना भी की जा रही है।

जिस दिन यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण स्थायी जन आंदोलन का रूप लेगी मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के लिए वह एक उल्लेखनीय दिवस होगा। श्रीकृष्ण की शिक्षा हमें बताती है कि ज्ञान पुस्तकों से जीवन में उतरना चाहिए, मित्रता में केवल संबंध नहीं विश्वास का समावेश भी होना चाहिए, धर्म में अनुष्ठान के साथ कर्तव्य भी दिखाई दे और संस्कृति केवल स्मृति नहीं बल्कि निरंतर प्रवाहित जीवनधारा रहे।
मध्यप्रदेश में मनाया जाने वाला ‘श्रीकृष्ण पर्व’ पूरे प्रदेश को कृष्णमयी बनाते हुए उत्साह और ऊर्जा का संचार करे। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में संस्कृति, विरासत, शिक्षा और पर्यटन का समन्वय निरंतर आगे बढ़ रहा है, मध्यप्रदेश अपनी ऐतिहासिक पहचान को मजबूत कर रहा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़कर विकास की नई कहानी लिख रहा है।
‘घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल’ का उद्घोष उस मध्यप्रदेश की कल्पना है जहां संस्कृति जनजीवन की शक्ति बन रही है और विरासत, विकास का मार्ग प्रशस्त कर रही है।

संदीप अखिल
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
सलाहकार संपादक



