सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बार फिर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के उन मामलों पर गंभीर चिंता जताई, जिनमें 15 से 18 वर्ष के किशोर-किशोरियों के आपसी सहमति वाले रिश्तों को आपराधिक मामलों में बदल दिया जाता है। अदालत ने कहा कि कई मामलों में माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या तथाकथित “इज्जत” बचाने के लिए POCSO के तहत शिकायत दर्ज कराते हैं, जबकि बाद में अदालत को आरोपियों को बरी करना पड़ता है।
किशोर रिश्तों और POCSO पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि 15 से 18 वर्ष की आयु संवेदनशील होती है, जहां किशोर नए अनुभवों की ओर आकर्षित होते हैं। अदालत ने सवाल किया कि यदि दोनों नाबालिग आपसी सहमति से रिश्ते में हैं और साथ चले जाते हैं, तो क्या हर ऐसा मामला स्वतः POCSO के दायरे में आना चाहिए?
क्या है पूरा मामला?
यह सुनवाई किशोरों के निजता के अधिकार से जुड़े एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले में हुई। मामला कलकत्ता हाई कोर्ट की उस विवादित टिप्पणी के बाद शुरू हुआ था, जिसमें किशोरियों को रिश्तों से दूर रहने और अपनी यौन इच्छाओं पर “काबू” रखने की सलाह दी गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस टिप्पणी को निरस्त कर दिया था।
वरिष्ठ वकील ने बताई मामले की पृष्ठभूमि
सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि मूल मामला एक नाबालिग लड़की के 25 वर्षीय युवक के साथ जाने से जुड़ा था। अब दोनों साथ रह रहे हैं और उनका एक बच्चा भी है। उन्होंने कहा कि इस मामले में गठित समिति ने POCSO मामलों में प्रणालीगत कमियों पर विस्तृत रिपोर्ट भी सौंपी है।
केंद्र सरकार का प्रस्ताव
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि बच्चों में कानूनी और सुरक्षा संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिए कक्षा 6 से चरणबद्ध तरीके से POCSO और यौन शिक्षा शुरू करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे किशोरों को उनके अधिकार, कानून और व्यक्तिगत सुरक्षा की बेहतर समझ विकसित होगी।
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