Supreme Court Reject Madrasa Teachers Permanent Job Plea: पश्चिम बंगाल के मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को नियमित करने की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और एजी मसीह की बेंच ने यह फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के सरकारी मदद वाले मदरसों के शिक्षकों और स्टाफ की स्थायी नौकरी और नियमित वेतन की याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों की जांच की पर कोई राहत योग्य आधार नहीं पाया।

यह विवाद ‘पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008’ से जुड़ा है, जिसके तहत मान्यता प्राप्त मदरसों में टीचरों की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए एक वैधानिक आयोग बनाया गया था। बंगाल के मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों ने सरकार की अनुदान योजना में स्थायी नौकरी और नियमित वेतन न मिलने के खिलाफ गुहार लगाई थी। मामला लगभग 361 लोगों द्वारा दायर 40 से ज्यादा रिट याचिकाओं से जुड़ा था, जिनका दावा था कि उन्हें पश्चिम बंगाल के अलग-अलग मदरसों में टीचर या नॉन-टीचिंग स्टाफ के तौर पर नियुक्त किया गया था। ये याचिकाएं संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थीं।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहले के आदेशों के अनुसार, उसने 350 से ज्यादा याचिकाकर्ताओं में से 13 प्रभावित याचिकाकर्ताओं के मामलों की जांच की थी, ताकि ये देखा जा सके कि क्या उनमें से किसी का मामला राहत पाने लायक है. कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई मामला नहीं था। कोर्ट ने कहा कि हमने इस आधार पर कार्यवाही है कि अगर इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई भी हमें अपने पक्ष में फैसला लेने के लिए मना पाता, तो हम बाकी मामलों की भी जांच करते। दुर्भाग्य से 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई भी हमें प्रभावित नहीं कर सका। लिहाजा इसलिए, कोर्ट ने उसके सामने मौजूद सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

मदरसा सेवा आयोग अधिनियम से जुड़ा केस

ये विवाद ‘पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008’ से जुड़ा है, जिसके तहत मान्यता प्राप्त मदरसों में टीचरों की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए एक वैधानिक आयोग बनाया गया था। 2014 में कलकत्ता हाई कोर्ट की सिंगल-जज बेंच ने इस अधिनियम को रद्द कर दिया था। 2015 में डिवीजन बेंच ने इस फैसले पर मुहर लगा दी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2016 में डिवीजन बेंच के फैसले पर रोक लगा दी। 6 जनवरी 2020 को ‘एसके. मो. रफीक बनाम मैनेजिंग कमिटी, कोंटाई रहमानिया हाई मदरसा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया।

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