वाराणसी के राजघाट से प्राप्त करीब 2800 साल पुराने मानव कंकाल पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों ने शोध कार्य शुरू कर दिया है। आधुनिक डीएनए जांच, कार्बन आइसोटोप और रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से प्राचीन काशीवासियों के खानपान, स्वास्थ्य और आनुवंशिक इतिहास के गूढ़ रहस्य उजागर होंगे।

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के इतिहास विभाग में वर्षों से संरक्षित लगभग 2800 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से परीक्षण शुरू कर दिया गया है। वर्ष 1957 से 1969 के बीच राजघाट में हुए पुरातात्विक उत्खनन के दौरान प्राप्त इस अवशेष पर अब तक कोई जैविक या वैज्ञानिक शोध नहीं किया गया था। बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग तथा जंतु विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ संयुक्त रूप से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

दांतों से सामने आएंगे खानपान के राज

शोधकर्ताओं का मुख्य ध्यान कंकाल के दांतों और हड्डियों में सुरक्षित रासायनिक संकेतों के विश्लेषण पर है। दांतों के एनैमल में मौजूद कार्बन और ऑक्सीजन आइसोटोप की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्राचीन काशीवासी शाकाहारी थे या मांसाहारी। इसके अतिरिक्त, गेहूं और बाजरा जैसे अनाजों के सेवन और दूध या दुग्ध उत्पादों के उपयोग का भी सटीक विवरण प्राप्त हो सकेगा।

ऑक्सीजन आइसोटोप से प्रवास की जानकारी

जीव वैज्ञानिक डॉ. ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार, दांतों में मौजूद ऑक्सीजन आइसोटोप तत्कालीन जलस्रोतों की पहचान करने में मदद करते हैं। इससे यह पता लगाया जाएगा कि संबंधित व्यक्ति जन्म से काशी का निवासी था या किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र से आकर बसा था। यह अध्ययन मध्य गंगा घाटी में प्राचीन आबादी के आवागमन के पैटर्न को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।

डीएनए और आनुवंशिक वंशावली की जांच

कंकाल की सटीक आयु और कालखंड निर्धारण के लिए रेडियोकार्बन डेटिंग की जा रही है। इसके साथ ही, प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह की देखरेख में नमूने एकत्रित किए गए हैं। अमेलोजेनिन जीन के परीक्षण से लिंग की पुष्टि की जाएगी। पुरुष होने की स्थिति में वाई-क्रोमोसोम हैप्लोग्रुप का अध्ययन कर पैतृक वंशावली का पता लगाया जाएगा, जिसकी तुलना सिंधु घाटी सभ्यता (राखीगढ़ी) से मिले आनुवंशिक आंकड़ों से भी की जाएगी।

बीएचयू और एएसआई का संयुक्त प्रयास

गंगा और वरुणा नदी के संगम पर स्थित राजघाट क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध माना जाता है। विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार ने बताया कि 1940 में रेलवे स्टेशन विस्तार के समय पहली बार यह पुरातात्विक स्थल प्रकाश में आया था। प्रो. एके नारायण और टीएन रॉय के निर्देशन में हुए उत्खनन के अवशेषों पर अब आधुनिक तकनीक से अध्ययन कर प्राचीन भारतीय नागरिकता और जीवनशैली के अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजे जा रहे हैं।