दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने अपने फैसले में कहा है कि ‘मारो और भागो’ जैसी हिंसक कार्रवाइयों को लोकतंत्र के किसी भी सिद्धांत के तहत विरोध का वैध तरीका नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन हिंसा और अराजकता फैलाने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। जस्टिस गिरीश कथपालिया की बेंच ने 16 मई को दिए अपने आदेश में समाज के एक वर्ग द्वारा विरोध की आड़ में कथित तौर पर अशांति फैलाने वाली गतिविधियों पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून और सार्वजनिक व्यवस्था की सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या लोगों में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों के नाम पर हिंसक गतिविधियों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘मारो और भागो’ जैसी हरकतों को लोकतंत्र के किसी भी सिद्धांत के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं, लेकिन हिंसा को किसी भी हालत में वैध विरोध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गिरीश कथपालिया की बेंच ने 16 मई के अपने आदेश में कहा, “हम फिर दोहराते हैं कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा हैं। लेकिन, विरोध के नाम पर की गई हिंसा को लोकतंत्र के किसी भी सिद्धांत के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। ‘मारो और भागो’ जैसी हरकतें विरोध प्रदर्शन नहीं कहलातीं।” कोर्ट ने आगे कहा कि यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है कि समाज का एक तबका विरोध की आड़ में अशांति फैलाने वाली गतिविधियों के सहारे फल-फूल रहा है।

निचली अदालत के आदेश को चुनौती

जज ने यह टिप्पणी तब की जब कोर्ट नौ लोगों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और धारा 436 (आग या विस्फोटक पदार्थ से शरारत) के तहत दर्ज मामलों से आरोपमुक्त किए जाने की उनकी अपील खारिज कर दी गई थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, लोगों में डर का माहौल बनाना या कानून-व्यवस्था बिगाड़ना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

2022 की एक घटना से जुड़ा मामला

यह मामला 21 जून 2022 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप है कि नौ लोगों का एक समूह मोती लाल नेहरू मार्ग स्थित बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के सरकारी बंगले के बाहर इकट्ठा हुआ और वहां नारेबाजी की। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने मुख्य सड़क पर जेपी नड्डा का पुतला जलाया और फिर वहां से भागने से पहले जलते हुए पुतले को बंगले के दरवाजे और छत की ओर फेंक दिया।

आरोपियों के खिलाफ कई धाराएं

इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा), 146 और 147 (दंगा), 149 (गैरकानूनी जमावड़ा), 278 (स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वातावरण बनाना), 285 (आग या ज्वलनशील पदार्थ के संबंध में लापरवाहीपूर्ण आचरण), 307 (हत्या का प्रयास), 436 (संपत्ति को नष्ट करने के इरादे से आग या विस्फोटक पदार्थ का प्रयोग) और 120B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

हालांकि, बाद में आरोपियों ने धारा 307 और 436 के तहत खुद को आरोपमुक्त करने के लिए अर्जी दाखिल की थी, लेकिन नवंबर 2025 में ट्रायल कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि घटना में किसी को कोई चोट नहीं लगी थी और न ही किसी को मारने का कोई इरादा था, इसलिए हत्या के प्रयास का आरोप उन पर नहीं बनता। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल विरोध प्रदर्शन करना था, न कि किसी को नुकसान पहुंचाना।

आरोपियों ने आगे तर्क दिया कि उनका कृत्य ज्यादा से ज्यादा IPC की धारा 285 के तहत आ सकता है, जो आग से जुड़े लापरवाहीपूर्ण आचरण से संबंधित है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि चूंकि किसी विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया गया था, इसलिए आईपीसी की धारा 436 के तहत अपराध लागू नहीं होता।

दिल्ली पुलिस ने याचिका का किया विरोध

हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस याचिका का विरोध किया और चश्मदीदों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि आरोपियों का इरादा सुरक्षा गार्डों की हत्या करना था। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि यदि यह घटना महज विरोध प्रदर्शन थी, तो यह समझ से परे है कि आरोपी जलते हुए पुतले को लेकर चौड़ा फुटपाथ और सर्विस रोड पार कर बंगले तक क्यों पहुंचे और उसे सुरक्षा कक्ष के दरवाजे तथा छत पर क्यों फेंका। अदालत ने आगे कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह दावा भी नहीं किया कि जलता हुआ पुतला गलती से उस स्थान पर जा गिरा था। कोर्ट ने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि यह किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई अचानक घटना नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया कृत्य था।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा, “अगर यह उस जाने-माने व्यक्ति के घर के बाहर किया गया एक साधारण विरोध प्रदर्शन होता, तो याचिकाकर्ता पुतला जलाने के बाद एक चौड़ा फुटपाथ और उसके बाद एक चौड़ी सर्विस रोड पार करके दूसरी तरफ क्यों जाते। फिर जलता हुआ पुतला बंगले के गेट और सिक्योरिटी रूम की छत के ऊपर से क्यों फेंकते।” अदालत ने कहा कि किसी भी पक्ष ने यह नहीं कहा कि जलता हुआ पुतला गलती से बंगले के गेट या सिक्योरिटी रूम के ऊपर जा गिरा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “याचिकाकर्ताओं ने जो किया वह कोई लापरवाही भरा काम नहीं था। वह साफ तौर पर एक जान-बूझकर किया गया काम था।”

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m