सोनीपत. आज एमडीडी ऑफ इंडिया, सोनीपत के जिला कार्यालय में Just Rights for Children (JRC) के सहयोग एवं मार्गदर्शन में “Voice of Survivor – पीड़ितों की कहानी, उनकी जुबानी” कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य बाल विवाह, बाल श्रम एवं पॉक्सो (POCSO) अपराधों से प्रभावित बच्चों एवं किशोरों को एक ऐसा मंच प्रदान करना था, जहां वे अपने जीवन के संघर्षों, चुनौतियों और पुनर्वास की यात्रा को स्वयं अपनी जुबानी साझा कर सकें। कार्यक्रम में बाल संरक्षण से जुड़े विभिन्न हितधारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बाल अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. ऋतु गिल, जिला बाल संरक्षण अधिकारी, सोनीपत रहीं। उन्होंने पीड़ित बच्चों एवं किशोरों द्वारा साझा किए गए अनुभवों को गंभीरता से सुना और कहा कि बच्चों की आवाज को सुनना तथा उन्हें अपनी बात रखने का अवसर देना बाल संरक्षण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक जीवन तथा न्याय प्राप्त करने का अधिकार है। उन्होंने आगे कहा कि बाल विवाह, बाल श्रम और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध जैसी सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए समाज, प्रशासन, परिवार और नागरिक संगठनों को मिलकर कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि पीड़ित बच्चों को केवल न्याय ही नहीं, बल्कि भावनात्मक सहयोग, पुनर्वास और सम्मानजनक अवसर भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान बाल विवाह, बाल श्रम एवं पॉक्सो से प्रभावित किशोर-किशोरियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और अपने जीवन के अनुभव साझा किए। एक बाल विवाह पीड़िता ने बताया कि कम आयु में उसका विवाह तय कर दिया गया था। वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन सामाजिक एवं पारिवारिक दबाव के कारण उसकी इच्छाओं को नजरअंदाज किया जा रहा था। समय पर बाल संरक्षण तंत्र और सामाजिक संगठनों के हस्तक्षेप से उसका विवाह रुकवाया गया। आज वह पुनः शिक्षा प्राप्त कर रही है और अपने भविष्य को संवारने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उसने अन्य लड़कियों से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और किसी भी प्रकार के दबाव का विरोध करने का आह्वान किया।

एक बाल श्रम पीड़ित किशोर ने अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि आर्थिक परिस्थितियों के कारण उसे कम उम्र में मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। कठिन परिस्थितियों में कार्य करने के कारण उसकी पढ़ाई छूट गई थी और उसका बचपन प्रभावित हुआ। बचाव और पुनर्वास की प्रक्रिया के बाद वह पुनः शिक्षा से जुड़ा और अब अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रयासरत है। उसने कहा कि बच्चों का स्थान कार्यस्थलों पर नहीं बल्कि विद्यालयों और खेल के मैदानों में होना चाहिए।
कार्यक्रम में एक पॉक्सो पीड़ित किशोरी ने भी अत्यंत साहस के साथ अपनी आपबीती सुनाई। उसने बताया कि शोषण का शिकार होने के बाद वह लंबे समय तक भय और मानसिक तनाव से जूझती रही। बाद में परिवार, बाल संरक्षण तंत्र और परामर्शदाताओं के सहयोग से उसे न्याय प्राप्त करने का साहस मिला। उसने कहा कि किसी भी प्रकार के शोषण या अपराध की स्थिति में बच्चों को चुप नहीं रहना चाहिए और समय रहते सहायता प्राप्त करनी चाहिए।
इस अवसर पर डॉ. राज सिंह सांगवान, बाल अधिकार कार्यकर्ता एवं जिला संयोजक, एमडीडी ऑफ इंडिया, सोनीपत ने कहा कि “Voice of Survivor” जैसे कार्यक्रम बच्चों की आवाज को समाज और व्यवस्था तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि जब पीड़ित बच्चे स्वयं अपनी कहानी सुनाते हैं, तब समाज को उनकी वास्तविक समस्याओं, चुनौतियों और आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि बाल विवाह, बाल श्रम और पॉक्सो जैसे अपराधों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के साथ-साथ पीड़ित बच्चों के पुनर्वास और सशक्तिकरण पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने सभी नागरिकों से बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने बाल अधिकारों, शिक्षा के महत्व, बाल संरक्षण कानूनों तथा पुनर्वास सेवाओं पर भी चर्चा की। उपस्थित सभी लोगों ने यह संकल्प लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्र में बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने, बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की रोकथाम करने तथा पीड़ित बच्चों के पुनर्वास में सहयोग प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयास करेंगे।
इस अवसर पर डॉ. ऋतु गिल, जिला बाल संरक्षण अधिकारी, सुनीता देवी, सरिता देवी, रामन्ना देवी, साहिल घंघास सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समापन सुरक्षित बचपन, बाल अधिकारों के संरक्षण और प्रत्येक बच्चे को न्याय दिलाने के सामूहिक संकल्प के साथ किया गया। एमडीडी ऑफ इंडिया एवं जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम न केवल पीड़ित बच्चों के लिए अपनी बात रखने का मंच बना, बल्कि समाज को यह संदेश देने में भी सफल रहा कि बच्चों की आवाज को सुनना, उनका सम्मान करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।
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