भोगराई। आंध्र प्रदेश के साथ जारी कोटिया सीमा विवाद के बाद अब ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित एक गांव को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्वतंत्र ओडिशा राज्य के गठन के 89 वर्ष बीत जाने के बाद भी सीमावर्ती गांव शंखामेदी के पूरी तरह पश्चिम बंगाल के नियंत्रण में चले जाने का खतरा मंडरा रहा है। इस वर्ष ओडिशा सरकार द्वारा कराए गए SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) मतदाता संशोधन सर्वेक्षण के अनुसार, शंखामेदी गांव के 268 ओड़िया मतदाताओं को पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया है।
इस संवेदनशील मामले को लेकर भोगराई के स्थानीय विधायक गौतम बुद्ध दास ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने राज्य के राजस्व मंत्री से मुलाकात कर एक मांग पत्र सौंपा है और इस ऐतिहासिक गांव को ओडिशा की भौगोलिक सीमा में बनाए रखने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
ग्रामीणों ने क्यों किया ओडिशा के ‘SIR’ सर्वेक्षण का विरोध?
यह पूरा विवाद तब सामने आया जब बालासोर जिले के भोगराई ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली अनलिया पंचायत के शंखामेदी गांव में बीएलओ (BLO) मतदाता पहचान पत्र संशोधन और एसआईआर (SIR) सर्वे के लिए पहुंचे थे। गांव के लोगों ने सर्वे टीम का कड़ा विरोध किया और उन्हें बैरंग वापस लौटा दिया।
ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले 40 से अधिक वर्षों से ओडिशा सरकार उन्हें स्थायी निवासी प्रमाण पत्र और उनकी जमीनों की लगान रसीद नहीं दे रही है। हद तो तब हो गई जब केंद्र और राज्य स्तर पर चल रही जनगणना (Census) प्रक्रियाओं में भी इस गांव को छोड़ दिया गया।
ग्रामीणों का साफ कहना है कि “अगर ओडिशा सरकार हमें अपना मानती है, तो पहले हमें स्थायी नागरिकता के दस्तावेज दे और हमारा नाम जनगणना में शामिल करे। इसके बाद ही हम ओडिशा के किसी भी सरकारी सर्वे का हिस्सा बनेंगे।”
स्थायी निवास प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र न मिलने के कारण इस गांव के बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। वे ओडिया माध्यम से पढ़ने के बावजूद उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों के लाभ से वंचित हो रहे हैं, साथ ही उन्हें पीएम आवास जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।
1978 से बंद है राजस्व वसूली, बंगाल उठा रहा फायदा
दस्तावेजों के अनुसार, शंखामेदी गांव से साल 1927 से लेकर 1980 के दशक की शुरुआत तक ओडिशा सरकार नियमित रूप से राजस्व वसूल करती थी। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण 1978 के बाद से यह प्रक्रिया धीरे-धीरे पूरी तरह बंद हो गई। ओडिशा की इसी ढिलाई का फायदा उठाकर पश्चिम बंगाल सरकार इस गांव को अपने पूर्व मेदिनीपुर जिले के रामनगर ब्लॉक के अधीन करने की पुरजोर कोशिश कर रही है।
एक गांव, दो राज्यों का शासन: अजीब कशमकश में लोग
हैरानी की बात यह है कि शंखामेदी गांव में फिलहाल दोनों राज्यों की व्यवस्थाएं समानांतर चल रही हैं। ओडिशा सरकार ने यहां एक प्राथमिक विद्यालय खोला है, जहां ओडिया शिक्षक तैनात हैं और बच्चे ओडिया भाषा में पढ़ते हैं। इसके साथ ही ओडिशा ने यहां बिजली, सड़क, शुद्ध पेयजल और राशन कार्ड की सुविधा दी है।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार भी इस गांव में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए बुनियादी सुविधाएं और अपनी राज्य स्तरीय आवास योजनाएं दे रही है। इस खींचतान का नतीजा यह है कि यहाँ के निवासियों के पास दोनों राज्यों के आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड मौजूद हैं और वे दोनों तरफ मतदान करते आ रहे हैं।
यदि ओडिशा सरकार ने तुरंत इस मामले में कोई ठोस और व्यावहारिक कदम नहीं उठाया, तो कानूनी और तकनीकी रूप से शंखामेदी गाँव हमेशा के लिए ओडिशा के नक्शे से मिट जाएगा और पश्चिम बंगाल का हिस्सा बन जाएगा।
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