रायगड़ा: एक तरफ हम देश में डिजिटल क्रांति और हर हाथ में स्मार्टफोन की बात करते हैं, वहीं ओडिशा के रायगड़ा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो इंडिटल इंडिया के दावों की पोल खोल दी है। यहाँ के आदिवासी बहुल और पहाड़ी इलाकों में बसे सैकड़ों गाँव आज भी मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जिले के कुल 2,612 गाँवों में से करीब 840 गाँवों में किसी भी टेलीकॉम कंपनी का नेटवर्क नहीं पहुँचता। इसका सीधा मतलब है कि जिले की 34 प्रतिशत आबादी आज भी पूरी तरह से डिजिटल दुनिया से कटी हुई है।
आज जहाँ स्कूल-कॉलेज के दाखिले, राशन कार्ड में नाम जुड़वाना, पेंशन के आवेदन या सरकारी योजनाओं का लाभ पाना सब कुछ ऑनलाइन हो चुका है, वहीं इन दूर-दराज के गाँवों के लोगों के लिए ये सब किसी जंग जीतने जैसा है। नेटवर्क न होने के कारण ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी मीलों का सफर तय करके प्रखंड मुख्यालयों या शहरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि 2024 के आम चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग के निर्देश पर इन्हीं इलाकों को ‘नो-शैडो जोन’ बनाते हुए टावरों की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई गई थी और अस्थायी नेटवर्क भी दिए गए थे। लेकिन चुनाव खत्म होते ही व्यवस्था फिर से ठप हो गई और हालात जस के तस हो गए।
नीति आयोग ने मुनिगुड़ा और पदमपुर ब्लॉकों को ‘आकांक्षी ब्लॉक’ घोषित किया है, लेकिन विडंबना यह है कि इन क्षेत्रों के ग्रामीण भी नेटवर्क के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हाल ही में हुई ‘दिशा’ (DISHA) की बैठक के आंकड़ों के अनुसार, जिले में बीएसएनएल के कुल 198 बीटीएस स्टेशन (2G, 3G, 4G और LTE को मिलाकर) काम कर रहे हैं।
प्रशासन भले ही जिले के सभी 11 ब्लॉकों में बीएसएनएल 4G पहुँचने का दावा कर रहा हो, लेकिन रायगड़ा के विशाल भौगोलिक दायरे और बिखरी हुई आबादी के सामने यह ऊंट के मुँह में जीरे जैसा ही है।
राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार के ‘डिजिटल भारत निधि’ फंड के तहत जिले में जियो के 790 नए टावर लगाने को मंजूरी मिली है। हालांकि, पक्की सड़कों और संपर्क मार्गों के अभाव में फिलहाल 16 जगहों पर काम अटका हुआ है, जिसकी जानकारी केंद्र को भेज दी गई है।
अतिरिक्त जिलाधिकारी (राजस्व) निहार रंजन कंहर का कहना है कि प्रशासन इस समस्या को लेकर गंभीर है और खास तौर पर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) वाले इलाकों में जल्द से जल्द कनेक्टिविटी पहुँचाने के लिए बुनियादी ढांचे को दुरुस्त किया जा रहा है। अब देखना होगा कि कागजों पर चल रही ये योजनाएं जमीन पर उतरकर कब तक रायगड़ा के इन भूले-बिसरे गाँवों तक रोशनी (यानी नेटवर्क) पहुँचा पाती हैं।
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