हेमंत शर्मा, इंदौर। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रही 83 वर्षीय बुजुर्ग महिला, जिसने पूरी जिंदगी सरकारी अस्पताल में सेवा देकर लोगों का इलाज किया, अब अपने ही जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। आरोप है कि जमीन दिलाने के नाम पर उन्हें कथित तौर पर ऐसा झांसा दिया गया कि उनकी जीवनभर की कमाई के 26.71 लाख रुपये निकलवा लिए गए। जब सच्चाई सामने आई तो पता चला कि जिस प्लॉट को निजी संपत्ति बताकर बेचा गया, वह एक गृह निर्माण सहकारी संस्था की जमीन है और उसे बेचने का अधिकार ही नहीं था।

मामला इतना गंभीर था कि बुजुर्ग महिला अपनी बहू और अधिवक्ताओं के साथ सीधे इंदौर पुलिस कमिश्नर की जनसुनवाई में पहुंचीं। पुलिस कमिश्नर ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच एसीपी अन्नपूर्णा को सौंप दी और निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा दिया।

‘दोस्ती’ से शुरू हुआ खेल, लाखों की रकम तक पहुंचा मामला

पीड़िता चंद्रप्रभा बुद्धीवंत और उनकी बहू सविता बुद्धीवंत के मुताबिक, सुमित कसलेकर ने पहले परिवार से नजदीकियां बढ़ाईं। इसके बाद दुर्गा नगर स्थित प्लॉट नंबर-16 को अपने साथी कमल सिंह जाट की संपत्ति बताकर खरीदने का प्रस्ताव दिया। आरोप है कि भरोसा दिलाया गया कि सभी दस्तावेज उनके पास हैं और पूरी प्रक्रिया पूरी तरह वैध है।

इसी भरोसे में परिवार ने पहले नकद लेन-देन किया। इसके बाद स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्री के नाम पर लाखों रुपये लिए गए। बैंक के दो चेक भी आरोपियों को सौंपे गए। इस तरह कुल 26 लाख 71 हजार रुपये कथित रूप से आरोपियों के पास पहुंच गए।

रजिस्ट्री हुई… लेकिन असली मालिक कोई और निकला!

शिकायत के अनुसार 16 फरवरी 2026 को पीड़िता के नाम रजिस्ट्री कर दी गई, लेकिन जब उन्होंने मूल दस्तावेज मांगे तो उन्हें सिर्फ नगर निगम के संपत्ति कर का रिकॉर्ड और संस्था का एक आवंटन पत्र दिया गया। जमीन के स्वामित्व से जुड़े मूल दस्तावेज कभी नहीं दिए गए।

जब परिवार ने खुद जांच शुरू की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। संबंधित गृह निर्माण सहकारी संस्था के कार्यालय से पता चला कि प्लॉट संस्था की संपत्ति है, संस्था लिक्विडेशन की प्रक्रिया में है और कमलसिंह जाट के नाम कभी वैध रजिस्ट्री हुई ही नहीं। यानी प्रथम दृष्टया जिस व्यक्ति ने जमीन बेची, उसके पास उसे बेचने का अधिकार ही नहीं था।

सिर्फ टैक्स रिकॉर्ड के सहारे बना दिया मालिक?

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि नगर निगम के संपत्ति कर खाते में नाम दर्ज होने का सहारा लेकर जमीन की खरीद-बिक्री दिखाई गई, जबकि वैध स्वामित्व के दस्तावेज मौजूद नहीं थे। आरोप है कि इसी आधार पर पूरी डील कराई गई और करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये का खेल खेला गया।

पहले भी दर्ज हो चुके हैं मामले होने का दावा

शिकायत में दावा किया गया है कि सुमित कसलेकर के खिलाफ पहले भी इसी तरह के मामलों में द्वारकापुरी और पंढरीनाथ थानों में धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और साजिश जैसी धाराओं में अपराध दर्ज हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि आरोपी पहले भी ऐसे मामलों में शामिल रहे हैं।

वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल

हाईकोर्ट अधिवक्ता कृष्ण कुमार कुन्हारे का कहना है कि सहकारी समिति की जमीन बिना संस्था की अनुमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के बेचना नियमों का उल्लंघन है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सहकारी समिति कानून और अन्य आपराधिक प्रावधानों के तहत गंभीर मामला बन सकता है।

हाईकोर्ट अधिवक्ता डॉ. रूपाली राठौर ने कहा कि नगर निगम के संपत्ति कर रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना किसी भी व्यक्ति को वैध मालिक नहीं बना देता। यदि बिना वैध टाइटल और संस्था की अनुमति के जमीन बेची गई है तो यह धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े का मामला हो सकता है।

अब पुलिस की जांच पर टिकी निगाहें

83 वर्षीय कैंसर पीड़िता ने पुलिस कमिश्नर से आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, कथित रूप से ठगे गए 26.71 लाख रुपये वापस दिलाने और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस कमिश्नर ने मामले की जांच एसीपी अन्नपूर्णा को सौंप दी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक बुजुर्ग महिला की जीवनभर की जमा-पूंजी कथित फर्जी दस्तावेजों के सहारे हड़प ली गई, या जांच में कोई दूसरा सच सामने आएगा? इसका जवाब पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।

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