Rajasthan News: पश्चिम एशिया (खाड़ी क्षेत्र) में ईरान और अन्य देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर अब केवल वैश्विक तेल बाजारों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसके तार राजस्थान की खेती और भविष्य की महंगाई से भी जुड़ते दिख रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण दुनिया भर में उर्वरक (खाद) की सप्लाई श्रृंखला प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जो राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

खाड़ी देश-सऊदी अरब, कतर, ओमान, यूएई और ईरान-यूरिया, अमोनिया और सल्फर जैसे उर्वरक घटकों के प्रमुख उत्पादक हैं। विशेष रूप से ईरान अमोनिया के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में गिना जाता है। यदि होर्मुज क्षेत्र में जारी तनाव के कारण शिपिंग या उत्पादन प्रभावित होता है, तो वैश्विक बाजार में खाद की उपलब्धता और कीमतों पर इसका सीधा असर पड़ना तय है।

राजस्थान के लिए क्या है स्थिति?

राजस्थान में जल्द ही खरीफ सीजन की तैयारी शुरू होने वाली है। ऐसे में खाद की उपलब्धता और कीमतों में कोई भी उतार-चढ़ाव सीधे किसानों की जेब और फसल की पैदावार पर असर डालेगा। हालांकि, राज्य सरकार ने फिलहाल स्थिति को नियंत्रण में बताया है।

कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि राजस्थान के पास उर्वरकों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। उन्होंने हालिया आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि राज्य में वर्तमान में यूरिया 2 लाख 80 हजार टन, डीएपी: 83 हजार टन, सिंगल सुपर फास्फेट 1 लाख 35 हजार टन, एनपीके 50 हजार टन का स्टॉक उपलब्ध है।

मंत्री ने भरोसा दिलाया कि रबी और खरीफ सीजन के लिए केंद्र सरकार से मिलने वाला कोटा पर्याप्त है और वर्तमान में किसी भी तरह का संकट नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं।

क्यों है चिंता का विषय?

भारत उर्वरक के मामले में बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। विशेष रूप से पोटाश पूरी तरह से आयात आधारित है और डीएपी के लिए भी देश को विदेशों का रुख करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो
इसके परिणाम कुछ महीनों बाद नजर आएंगे:

  1. खेती की लागत: खाद के महंगे होने से किसानों की लागत बढ़ जाएगी।
  2. पैदावार पर असर: यदि खाद की कमी हुई, तो किसान कम उर्वरक डालने को मजबूर होंगे, जिससे फसल की पैदावार गिर सकती है।
  3. खाद्यान्न महंगाई: पैदावार घटने का सीधा असर बाजार में अनाज की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ सकता है।
  4. सब्सिडी का बोझ: आयात महंगे होने से केंद्र सरकार पर सब्सिडी का अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।

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