दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी आपराधिक मामले में केवल सबूतों के अभाव में बरी होने को पूरी तरह निर्दोष माना नहीं जा सकता। अदालत ने ऐसे एक व्यक्ति को Delhi Police में भर्ती से रोके जाने के फैसले को सही ठहराया है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत से बाइज्जत बरी होना और परिस्थितियों या साक्ष्यों की कमी के कारण बरी होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि किसी व्यक्ति को साक्ष्यों की कमी के कारण बरी किया गया है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह पूरी तरह निर्दोष है।
‘साक्ष्य या गवाह न मिलने पर ही किसी को निर्दोष मानते हैं’
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल व जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने युवक की याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह दिल्ली पुलिस जैसी अनुशासनात्मक फोर्स का हिस्सा बनने के योग्य नहीं है, क्योंकि वह एक गंभीर आपराधिक मामले में आरोपी रह चुका है। बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अदालत से बरी होना ही पर्याप्त नहीं होता। किसी व्यक्ति को वास्तव में निर्दोष तब माना जाता है जब उसके खिलाफ कोई साक्ष्य या गवाह ही न हों। वहीं यदि गवाह अपने बयान से मुकर जाएं या आरोपी और गवाहों के बीच समझौते के कारण आरोपी बरी हो जाए, तो ऐसी स्थिति में उसे पूरी तरह निर्दोष नहीं माना जा सकता।
चरित्र सत्यापन में सामने आया आपराधिक रिकॉर्ड
हाईकोर्ट में पेश मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता युवक के पिता दिल्ली पुलिस में कार्यरत थे और वर्ष 2013 में उनका निधन हो गया था। इसके बाद वर्ष 2014 में युवक का नाम दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल (लिपिक वर्ग) के पद पर अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए मंजूर किया गया था। इस दौरान उसके चरित्र और पिछली पृष्ठभूमि के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की गई। चरित्र सत्यापन के दौरान यह सामने आया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर नंबर 138/2009 के तहत विभिन्न धाराओं में आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। इस तथ्य के सामने आने के बाद उसकी नियुक्ति पर रोक लगा दी गई थी।
गवाहों के मुकरने पर वर्ष 2011 में बरी हुआ था
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता दिल्ली पुलिस में कार्यरत थे और वर्ष 2013 में उनका निधन हो गया था। इसके बाद वर्ष 2014 में युवक का नाम हेड कॉन्स्टेबल (लिपिक वर्ग) के पद पर अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए मंजूर किया गया था। नियुक्ति की प्रक्रिया के तहत जब उसके चरित्र और पृष्ठभूमि का सत्यापन किया गया तो पता चला कि उसके खिलाफ एफआईआर नंबर 138/2009 के तहत एक गंभीर आपराधिक मामला दर्ज था।
हालांकि युवक वर्ष 2011 में इस मामले से बरी हो चुका था, लेकिन संबंधित पुलिस अधिकारियों ने जब मुकदमे की फाइल की जांच की तो सामने आया कि उसे बरी किए जाने का कारण चश्मदीद गवाहों का अपने बयान से मुकर जाना था। साथ ही पीड़ित पक्ष के साथ समझौता भी सामने आया था। बदलती परिस्थितियों के चलते अदालत ने उसे मजबूरी में बरी किया था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अदालत से बरी होना ही पर्याप्त नहीं होता। यदि किसी मामले में गवाह मुकर जाएं या समझौते के कारण आरोपी बरी हो जाए, तो उसे पूरी तरह निर्दोष नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि पुलिस जैसी संवेदनशील और अनुशासनात्मक सेवा में भर्ती के लिए उम्मीदवार का चरित्र और पृष्ठभूमि पूरी तरह साफ होना आवश्यक है।
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