Corona Returns: अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध के कारण विश्व में उथल-पुथल मची हुई है। ईरान युद्ध के बीच एक बार फिर कोरोना या कहे कोविड-19 (COVID-19) की वापसी हुई है। कोरोना वायरस का एक नया रूप दुनिया की दहलीज पर दस्तक दी है। कोरोना का नया वैरिएंट ‘सिकाडा’ (Corona Cicada Variant) ने 23 देशों में दस्तक दे दी है। इस वैरिएंट का सबसे ज्यादा असर अमेरिका में देखने को मिल रहा है। यह अमेरिका में जंगल की आग की तरह फैल रहा है। BA.3.2 असल में Omicron का ही एक वंशज (Descendant) है। ओमिक्रॉन वही वेरिएंट था, जिसने 2021 के आखिर में पूरी दुनिया को हिला दिया था। हालांकि BA.3.2 पिछले वेरिएंट्स के मुकाबले काफी अलग है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि Covid-19 का एक नया वैरिएंट Cicada BA.3.2 पूरी दुनिया में चुपचाप फैल रहा है। इसमें म्यूटेशन की संख्या असामान्य रूप से ज्यादा है। इसका भारत पर भी असर हो सकता है। हालांकि कब और कितना असर होगा, इस पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ फिलहाल कुछ नहीं कह पा रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने सबसे पहले BA.3.2 को नवंबर 2024 में अफ्रीका में पहचाना था। साल 2025 में इसने अपनी वैश्विक यात्रा शुरू की और फरवरी 2026 तक यह दुनिया के 23 देशों में पैर पसार चुका था। अमेरिका में इसका पहला मामला जून 2025 में एक यात्री में मिला था। आज स्थिति ये है कि अमेरिका के 29 राज्यों के ‘Wastewater’ यानी सीवेज के पानी की निगरानी में इस वेरिएंट के निशान मिल रहे हैं। सीवेज मॉनिटरिंग वेरिएंट के फैलाव को समझने का सबसे सटीक तरीका माना जाता है, और आंकड़े बता रहे हैं कि ये वेरिएंट बहुत चुपके से (Under the radar) फैल रहा है।

नवंबर 2024 से अफ्रीका से फैलना हुआ शुरू

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके Spike Protein में 70 से 75 आनुवंशिक बदलाव (Genetic Changes) देखे गए हैं। स्पाइक प्रोटीन वायरस का वो हिस्सा होता है जो हमारे शरीर की कोशिकाओं में घुसने में मदद करता है। अब चुनौती ये है कि हमारी वैक्सीन इसी स्पाइक प्रोटीन को पहचान कर हमला करना सीखती हैं, लेकिन जब प्रोटीन ही इतना बदल जाए, तो वैक्सीन इसे पहचानने में धोखा खा सकती है।

सीवेज के पानी की जांच से ‘Cicada’ वेरिएंट की पहचान

इस अदृश्य खतरे को पहचानने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अनोखा ‘जासूसी’ तरीका अपनाया है – ‘वेस्टवॉटर मॉनिटरिंग’ यानी सीवेज के पानी की जांच। अमेरिका के 29 राज्यों में जब मरीजों की अस्पतालों में भीड़ लगनी शुरू भी नहीं हुई थी, तब वहां के गंदे पानी के सैंपल्स में इस ‘Cicada’ वेरिएंट के निशान मिल गए थे। यह तकनीक हमें बीमारी के फैलने से हफ्तों पहले आगाह कर देती है। हालांकि, चिंता की बात यह है कि साल 2022 के बाद से दुनिया भर में इस तरह के डेटा शेयरिंग सिस्टम में कमी आई है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर हम अपनी इस ‘बायोलॉजिकल जासूसी’ को धीमा करेंगे, तो वायरस के अगले बड़े हमले को समय रहते भांपना नामुमकिन हो जाएगा।

कोरोना के इस नए वेरिएंट का नाम ‘Cicada’ क्यों पड़ा?

यहां एक और दिलचस्प तथ्य है- इस वेरिएंट का नाम ‘Cicada’ क्यों पड़ा? दरअसल, सिकाडा एक ऐसा कीड़ा है जो सालों तक जमीन के नीचे छिपा रहता है और फिर अचानक बाहर निकलकर सबको चौंका देता है। ठीक वैसे ही, BA.3.2 भी साल 2024 के अंत से ‘अंडर द राडार’ यानी वैज्ञानिकों की नजरों से बचकर खामोशी से फैल रहा था। सबसे चौंकाने वाली बात इसके स्पाइक प्रोटीन में मौजूद 70 से 75 म्यूटेशन हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस के सामान्य विकास से कहीं ज्यादा बड़ी छलांग है। यह विज्ञान के लिए किसी पहेली से कम नहीं है कि कैसे एक वायरस ने अपना हुलिया इतना बदल लिया कि वह अब हमारी पुरानी वैक्सीन को चकमा देने की पूरी ताकत रखता है।

भारत में अभी स्थिति नियंत्रित, फैलने का डर बरकरार

अब बात करते हैं भारत पर इसका असर है। दरअसल, भारत की जीनोम सीक्वेंसिंग संस्था INSACOG ने हाल ही में बताया है कि देश में XFG वेरिएंट के 163 मामले मिले हैं। यह भी ओमिक्रॉन का ही एक म्यूटेटेड रूप है। ग्लोबल लेवल पर BA.3.2 और भारत में XFG जैसे वेरिएंट्स का उभरना इस बात का संकेत है कि वायरस लगातार अपना रूप बदल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अभी स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के माध्यम से BA.3.2 के प्रसार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हमारी निगरानी प्रणालियों को एक बार फिर सतर्क होने की जरूरत है।

पुरानी वैक्सीन नए खतरे का कर पाएगी मुकाबला?

? वर्तमान में हम जो बूस्टर या वैक्सीन ले रहे हैं, वे मुख्य रूप से JN.1 जैसे पुराने वेरिएंट्स को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं। लेकिन वैज्ञानिकों की मानें तो BA.3.2 यानी ‘Cicada’ हमारे शरीर के लिए एक ‘कम्पलीट स्ट्रेंजर’ (Complete Stranger) की तरह है। पल्मोनरी एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि चूंकि इस वेरिएंट का हुलिया पिछले वायरस से बिल्कुल अलग है, इसलिए हमारा इम्यून सिस्टम इसे उतनी तेजी से नहीं पहचान पाएगा, जितनी तेजी से इसे पहचानना चाहिए। इसका मतलब ये नहीं कि वैक्सीन बेकार है- वो अब भी अस्पताल जाने की नौबत और मौत के खतरे से बचाती है। लेकिन इस नए वेरिएंट के साथ ‘परफेक्ट मैच’ न होने के कारण यह वायरस हमारे शरीर के सुरक्षा कवच में सेंध लगाने में कामयाब हो रहा है।

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