केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस संवेदनशील मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के लिए 9 जजों की संविधान पीठ का गठन किया है. यह नौ जजों की पीठ 7 अप्रैल 2026 से उन मामलों की सुनवाई शुरू करेगी, जो सीधे तौर पर महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार और परंपरागत मान्यताओं के टकराव से जुड़े हैं, जिसकी अध्यक्षता खुद सीजेआई सूर्यकांत करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर बड़ी सुनवाई की तैयारी कर ली है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई में गठित नौ जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल 2026 से पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगी.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और आस्था के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिए 9 जजों की बेंच का गठन किया है. यह नौ जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करेगी, जिसमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ (महिला जननांग विकृति) की प्रथा को खत्म करने और पारसी महिलाओं को अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं.

उन्होंने नौ जजों की एक विशेष संविधान पीठ का गठन किया है, खास बात यह है कि इस पीठ में अलग-अलग धर्मों के न्यायाधीशों के साथ एक महिला जज को भी शामिल किया गया है, ताकि फैसले की निष्पक्षता और व्यापकता पर कोई सवाल न उठे.

इस संविधान पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्न एम वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं.

यह मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2018 के फैसले से जुड़ा है. तब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह परंपरा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) की मूल भावना के खिलाफ है.

दरअसल, यह पूरा विवाद भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था से जुड़ी हुई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी.

इस फैसले के बाद देशभर में बहस छिड़ गई और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं. इसके साथ ही अन्य धार्मिक प्रथाओं को भी चुनौती मिलने लगी. इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ (महिला जननांग विकृति) की प्रथा को खत्म करने और पारसी महिलाओं को अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं. केंद्र सरकार ने भी सबरीमाला फैसले की समीक्षा की मांग का समर्थन किया था.

साल 2019 में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने मूल फैसले को बरकरार रखते हुए इन व्यापक मुद्दों को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था. इसके बाद सीजेआई बने जस्टिस एसए बोबडे ने इस मामले को नौ जजों की संविधान पीठ को सौंपा था, ताकि यह तय किया जा सके कि जब धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों में टकराव हो तो किसे प्राथमिकता दी जाए.

इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय न्यायपालिका के लिए एक अहम मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह सिर्फ एक मंदिर या परंपरा का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि आधुनिक संविधान में महिलाओं के समान अधिकार और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

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