जीतेन्द्र सिन्हा, राजिम। एक ओर राज्य सरकार डिजिटलीकरण और पारदर्शिता के बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर हालात इसके ठीक उलट दिखाई दे रही है। छुरा क्षेत्र से सामने आए ताजा मामलों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारी “पैसे के खेल” में इस कदर लिप्त हैं कि बिना रिश्वत के आम किसानों के वैध कार्य वर्षों तक लंबित रहते हैं, जबकि अनियमित और संदिग्ध मामलों को आसानी से निपटा दिया जाता है।

आदिवासी महिला के नाम पर फर्जी फौती, 20 लाख का लोन
ग्राम कुड़ेरादादर में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक आदिवासी महिला की जानकारी के बिना उसकी जमीन का फौती दर्ज कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उसी जमीन के आधार पर लगभग 20 लाख रुपये का लोन भी स्वीकृत हो गया। इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी महिला को काफी समय बाद लगी, जिससे परिवार सदमे में है और न्याय की मांग कर रहा है।
जमीन हेराफेरी का खेल: आधी जमीन दूसरे के नाम

ग्राम हीराबतर में भी जमीन हेराफेरी का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि एक आदिवासी किसान की आधी जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम रजिस्ट्री और नामांतरण कर दी गई, जबकि शेष जमीन अब भी मूल किसान के नाम पर है। ऐसे मामलों ने राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिश्वत मांगने के ऑडियो-वीडियो वायरल
कोसमी क्षेत्र में एक पटवारी का कथित ऑडियो-वीडियो सामने आया है, जिसमें वह जमीन से जुड़े दस्तावेज और नक्शा उपलब्ध कराने के एवज में पैसे की मांग करता सुनाई दे रहा है। बातचीत में यह भी कहा जा रहा है कि “ऊपर तक पैसा पहुंचाना पड़ता है”, जिससे पूरे तंत्र में भ्रष्टाचार की आशंका और गहरी हो जाती है।
नियमों की अनदेखी: बिना अनुमति रजिस्ट्री के आरोप
क्षेत्र में कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां कलेक्टर की अनुमति के बिना जमीन की रजिस्ट्री संभव नहीं थी, लेकिन कथित रूप से “सेवा-पानी” के बाद न केवल बिक्री की प्रक्रिया पूरी हुई, बल्कि रजिस्ट्री भी कर दी गई। यह सीधे तौर पर नियमों की अवहेलना और मिलीभगत की ओर संकेत करता है।
3 साल से न्याय के लिए भटक रहा किसान
ग्राम हीराबतर के एक किसान की पीड़ा इस व्यवस्था की सच्चाई बयां करती है। अपनी पुश्तैनी जमीन का रकबा सुधार कराने के लिए वह पिछले तीन वर्षों से तहसील और अनुविभागीय कार्यालय के चक्कर काट रहा है।
किसान के अनुसार उसकी जमीन 0.45 हेक्टेयर से घटकर 0.35 हेक्टेयर दर्ज कर दी गई, जबकि पड़ोसी का रकबा बढ़ गया। उसने पुराने दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन तहसील और एसडीएम स्तर पर मामला खारिज कर दिया गया। अब उसे कलेक्टर कार्यालय का रुख करने को कहा गया है। हताश किसान अब भूख हड़ताल की तैयारी में है।
डिजिटल दावे बनाम जमीनी सच्चाई
सरकार द्वारा ऑनलाइन और डिजिटल सिस्टम को पारदर्शिता का माध्यम बताया जा रहा है, लेकिन छुरा क्षेत्र के ये मामले दिखाते हैं कि सुधार के दावे अभी भी कागजों तक सीमित हैं। जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, देरी और मनमानी का सिलसिला जारी है।
बड़ा सवाल: कब लगेगी लगाम?
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों से किसानों का भरोसा डगमगा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजस्व विभाग में चल रहे इस “पैसे के खेल” पर आखिर कब सख्त कार्रवाई होगी? क्या सरकार दोषियों पर कार्रवाई कर पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी या किसान यूं ही न्याय के लिए भटकते रहेंगे?
कलेक्टर का बयान
मामले में गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने कहा कि लिखित में इस कार्यालय को शिकायत किए जाने पर मामले की जमीनी स्तर पर जांच कर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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