Odisha Desk, भुवनेश्वर: ओडिशा में नवीन पटनायक के 24 वर्षों के लंबे शासन का अंत कर सत्ता में आई मोहन चरण माझी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के कार्यकाल को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा तेज हो गई है। राज्य में परिवर्तन, सुशासन और त्वरित विकास के वादे के साथ सरकार बनाने वाली भाजपा के सामने अब जनता की उच्च अपेक्षाओं को पूरा करने तथा अपनी प्रशासनिक दक्षता साबित करने की बड़ी चुनौती है।
चुनावी दौर में किए गए लोकलुभावन वादों और जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन के बीच एक अंतर महसूस किया जा रहा है। नवीन पटनायक के शांत, स्थिर और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित मॉडल की तुलना में भाजपा की “डबल इंजन सरकार” के परिणाम अभी भी प्रशासनिक स्तर पर पूरी तरह दृश्यमान नहीं हो सके हैं। राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर घोषणाओं को धरातल पर उतारने, नौकरशाही एवं राजनीतिक नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और जनसेवा वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
सुधार और भावी रणनीति के प्रमुख बिंदु
ठोस एवं दृश्यमान परिणाम: बड़ी अवसंरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं को गति देने के साथ-साथ आम नागरिकों से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं में त्वरित सुधार।
सकारात्मक संवाद एवं दृष्टिकोण: ‘डबल इंजन’ शासन की उपलब्धियों और योजनाओं के वास्तविक लाभों को जनता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाना।
संगठनात्मक एवं प्रशासनिक समन्वय: राज्य नेतृत्व और नौकरशाही के बीच समन्वय मजबूत करना तथा स्थानीय राजनीतिक संस्कृति के अनुकूल फैसले लेना।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के हालिया चुनावी उदाहरण यह दर्शाते हैं कि केवल केंद्रीय नेतृत्व या राष्ट्रीय लहर के भरोसे राज्य की राजनीति में लंबे समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखना संभव नहीं है। स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन ही निर्णायक होता है। 2029 का विधानसभा चुनाव यद्यपि अभी दूर दिखाई देता है, परंतु जन-असंतोष धीरे-धीरे आकार लेता है। ऐसे में मोहन मांझी सरकार को केवल एक ‘विकल्प’ बनने के बजाय नवीन पटनायक के सुशासन का एक विश्वसनीय ‘उत्तराधिकारी’ बनकर उभरना होगा। आने वाले समय में सरकार की कार्यशैली और रणनीतिक बदलावों पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी रहेगी।
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