प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली दंगा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान और उनके करीबी डॉ. नफीस खान की जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे को देश के कानून और एकता के लिए खुली चुनौती बताया. अदालत ने कहा कि ऐसा नारा लोगों को हिंसा और देश के खिलाफ उकसाने वाला है.

इसे भी पढ़ें- राहुल गांधी का दो दिवसीय रायबरेली दौरा आज से, कई कार्यक्रमों में होंगे शामिल

धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती तुलना

जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने कहा कि इस नारे की तुलना ‘जय श्रीराम’, ‘हर हर महादेव’, ‘सत श्री अकाल’ या ‘अल्लाहु-अकबर’ जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती. कोर्ट ने कानून-व्यवस्था बिगाड़ने, हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले कृत्यों को मंजूरी देने से इनकार किया.

बरेली दंगे में तौकीर पर गंभीर आरोप

तौकीर रजा 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुए बवाल के मामले में आरोपी हैं और 27 सितंबर से जेल में हैं. पुलिस ने उन्हें दंगे का मुख्य साजिशकर्ता बताया है. मामला ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद से जुड़ा था. पुलिस के अनुसार प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान की ओर पहुंचे थे.

भीड़ पर पथराव और पेट्रोल बम का आरोप

सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि 19 सितंबर को बैठक कर लोगों से प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की गई थी. बाद में प्रशासन ने बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर पांच या उससे अधिक लोगों के जुटने पर रोक लगा दी. इसके बावजूद करीब 200-250 लोग पहुंचे और पुलिस के रोकने पर कथित तौर पर पथराव व पेट्रोल बम से हमला किया गया. कई पुलिसकर्मी घायल हुए.

इसे भी पढ़ें- सहारनपुर में मस्जिद के मलबे के नीचे मिला कुआं, लखौरी ईंटों से बनी है संरचना, ASI ने क्या कहा?

तौकीर के वकील ने बताया राजनीतिक साजिश

तौकीर रजा के वकील ने अदालत में कहा कि उन्हें राजनीतिक रंजिश के कारण फंसाया गया है. उनका दावा था कि तौकीर ने हिंसा का आह्वान नहीं किया और घटना के समय घर में नजरबंद थे. हालांकि कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं.