असम में विधानसभा चुनाव हो चुका है. आज राज्य की सियासत के लिए सबसे बड़ा दिन है. राज्य की सभी 126 सीटों पर इस बार एक ही चरण में 9 अप्रैल को मतदान हुआ था. असम में बीजेपी तीसरी बार सरकार बनाने की तरफ दिखाई दे रही है. 126 सीटों में से अभी तक सामने आए 123 सीटों के शुरुआती रुझानों के मुताबिक बीजेपी गठबंधन 93 सीटों पर आगे है जबकि कांग्रेस गठबंधन 28 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं. यानि रुझानों में बीजेपी असम में सत्ता की हैट्रिक लगाने जा रही है.
बात करें राज्य के हाई प्रोफाइल सीटों की तो असम में जोरहाट विधानसभा सीट पर कांग्रेस नेता गौरव गोगोई लगातार बढ़त बनाए हुए हैं. वहीं जालुकबारी की तो यहां सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की एकतरफा बढ़त जारी है. इस सीट को भाजपा का गढ़ माना जाता है और हिमंत बिस्वा सरमा यहां से 25 साल से विधायक हैं, लेकिन इस बार नतीजों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं.
सकारात्मक परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे: गौरव गोगोई
शुरुआती मतगणना रुझानों पर असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कहा, “हम असम में सकारात्मक परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम मतगणना के हर दौर पर पैनी नजर रखेंगे। हमने पूरे राज्य में अपने पर्यवेक्षक तैनात किए हैं ताकि यदि किसी भी दौर में प्रशासन की ओर से कोई कमी दिखे, तो हमें तुरंत जानकारी मिल सके। मतदान के बाद, हमारी टीमों ने बिना ताला लगे कमरों में बिना इस्तेमाल की गई ईवीएम (EVMs) रखी हुई देखीं… हमारे सीएलपी (CLP) ने भी ऐसे व्यक्तिगत मामले देखे। हमने प्रशासन की ओर से थोड़ी लापरवाही देखी है… हमारे उम्मीदवारों पर हमले किए गए, फिर भी चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। हमने उन विभिन्न अधिकारियों के बारे में बात की जो भाजपा सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे, फिर भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। जब आपके पास ऐसा माहौल हो, तो यह चुनाव आयोग के लिए अच्छा नहीं दिखता…”
सत्ता का ‘मैजिक नंबर’, 64 सीटों की जंग
आपको बता दें कि असम की सत्ता पर काबिज होने के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा 64 है. असम विधानसभा में कुल 126 सीटें हैं. नियम के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए सदन में बहुमत सिद्ध करना होता है. बहुमत के लिए कुल सीटों के आधे से कम से कम एक अधिक सीट की जरूरत होती है.
यानी, जिस भी दल या गठबंधन के पास 64 या उससे अधिक विधायक होंगे, वह राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश कर सकता है. यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो इसे त्रिशंकु विधानसभा कहा जाता है, जहां चुनाव के बाद गठबंधन की भूमिका अहम हो जाती है.
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