Bastar News Update : कोंडागांव। अवैध मादक पदार्थों की तस्करी पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। 21.050 किलोग्राम गांजा परिवहन के मामले में आरोपी को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई है। साथ ही एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। मामला फरवरी 2024 का है, जब केशकाल पुलिस ने एनएच-30 पर कार्रवाई की थी। मोटरसाइकिल की तलाशी में गांजा बरामद हुआ था। आरोपी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर का निवासी बताया गया। विशेष न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दोष सिद्ध होने पर फैसला सुनाया।
जुर्माना जमा नहीं करने पर अतिरिक्त एक वर्ष की सजा भी भुगतनी होगी। विचारण अवधि के दौरान जेल में बिताए गए 559 दिनों को कुल सजा में समायोजित किया जाएगा। इस फैसले को मादक पदार्थ तस्करी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने इसे अपराधियों के लिए स्पष्ट संदेश बताया है।
एचपीवी टीकाकरण की रफ्तार धीमी, अब हर पात्र किशोरी तक पहुंचने की चुनौती
बस्तर जिले में एचपीवी टीकाकरण अभियान अभी अपने लक्ष्य से काफी पीछे है। करीब 9,554 पात्र किशोरियों में से अब तक केवल 5,846 को ही वैक्सीन लग पाई है। यानी लगभग 39 प्रतिशत बालिकाएं अभी भी टीकाकरण से वंचित हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने विशेष अभियान शुरू किया है। 3 से 8 अगस्त तक जिले के 529 विद्यालयों में विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं। अभियान का उद्देश्य 14 वर्ष पूर्ण कर चुकी और 15 वर्ष से कम आयु की सभी पात्र बालिकाओं तक पहुंचना है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि एचपीवी वैक्सीन गर्भाशय ग्रीवा कैंसर से बचाव का प्रभावी माध्यम है। जागरूकता की कमी को अभियान की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। स्कूलों के साथ अभिभावकों की काउंसिलिंग पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने सभी संस्थानों को समन्वय बनाकर शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने के निर्देश दिए हैं। अब नजर इस बात पर है कि विशेष अभियान कितना सफल साबित होता है।
एक साल की देरी ने छीन लिया आशियाना, मुआवजे के इंतजार में बेघर हुआ परिवार
बस्तर जिले की मैलबेड़ा पंचायत से प्रशासनिक राहत व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। पिछले वर्ष बारिश में एक ग्रामीण का कच्चा मकान क्षतिग्रस्त हुआ था। निरीक्षण के बाद जल्द मुआवजा देने का आश्वासन भी मिला था, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी। मरम्मत नहीं होने से इस वर्ष की बारिश में मकान पूरी तरह ढह गया। अब पूरा परिवार बेघर होकर मुश्किल हालात का सामना कर रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि समय पर सहायता मिलती तो यह स्थिति नहीं बनती। लोग सवाल उठा रहे हैं कि निरीक्षण और आश्वासन का लाभ आखिर कब मिलेगा। प्राकृतिक आपदा प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत देना प्रशासन की जिम्मेदारी बताई जा रही है। ग्रामीणों ने नियमानुसार मुआवजा और आवासीय सहायता देने की मांग की है। यह मामला आपदा राहत व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल छोड़ रहा है।
उड़ने वाला तक्षक नाग
दंतेवाड़ा का बैलाडीला क्षेत्र सिर्फ लौह अयस्क के लिए ही नहीं, बल्कि दुर्लभ जैव विविधता के लिए भी पहचान बना रहा है। इन्हीं वनों में तक्षक नाग जैसी विलुप्तप्राय प्रजाति का प्राकृतिक आवास मौजूद है। वैज्ञानिक नाम क्राइसोपीलिया ऑर्नाटा वाला यह सांप हवा में 50 से 60 फीट तक ग्लाइड करने की क्षमता रखता है। छलांग लगाते समय यह अपने शरीर को अंग्रेजी के ‘S’ आकार में मोड़ लेता है।
जानकारों के अनुसार बैलाडीला का ठंडा और वनाच्छादित वातावरण इसके लिए अनुकूल माना जाता है। तक्षक को मध्यम विषैला सर्प माना जाता है, जिसका जहर छोटे जीवों के शिकार में अधिक प्रभावी होता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि इसके काटने से सामान्यतः इंसान की जान को खतरा नहीं होता। पौराणिक ग्रंथों में भी तक्षक नाग का उल्लेख राजा परीक्षित की कथा से जुड़ा मिलता है। बताया जाता है कि तीरथगढ़ क्षेत्र में भी इसके देखे जाने की जानकारी सामने आ चुकी है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण बस्तर की जैव विविधता के लिए बेहद जरूरी है। बैलाडीला आज खनिज संपदा के साथ-साथ प्राकृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
चपका बना आस्था और इतिहास का संगम, जहां आज भी जीवंत है मार्कण्डेय ऋषि की तपस्थली
बस्तर का चपका गांव केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन इतिहास और आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। जगदलपुर से करीब 42 किलोमीटर दूर स्थित इस स्थान पर आज भी मार्कण्डेय ऋषि से जुड़ी विरासत सुरक्षित है।
मारकंडी नदी किनारे ऋषि की प्राचीन प्रतिमा और धूनी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है। मान्यता है कि भगवान शिव ने यहीं मार्कण्डेय ऋषि को दीर्घायु होने का वरदान दिया था। इसी तपस्थली को मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती की रचना से भी जोड़ा जाता है। यहां मौजूद प्राकृतिक जलकुंड और 10वीं-11वीं शताब्दी की दुर्लभ मूर्तियां इसकी ऐतिहासिक पहचान बढ़ाती हैं।
महाशिवरात्रि पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। चपका में शिवालय के साथ भगवान जगन्नाथ, मां दुर्गा और श्रीराम के मंदिर भी स्थित हैं। धार्मिक मान्यताओं के साथ यह स्थान सामाजिक जागरूकता का भी प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस विरासत का व्यापक संरक्षण और पर्यटन के रूप में विकास जरूरी है। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान में चपका आज भी एक महत्वपूर्ण अध्याय बना हुआ है।

लाल मलबे से घिरती खेती, अब पर्यावरण नहीं आजीविका का सवाल
नारायणपुर के रावघाट क्षेत्र में बारिश के साथ लाल मलबे की समस्या फिर गंभीर होती नजर आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि माइंस से निकल रहा अपशिष्ट खेतों और जलस्रोतों तक पहुंच रहा है। बताया जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से हर बारिश में यही स्थिति बनती है। किसानों का कहना है कि धान की फसल और कृषि भूमि लगातार प्रभावित हो रही है। पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीण वैज्ञानिक जांच और जल गुणवत्ता परीक्षण की मांग कर रहे हैं। फसल नुकसान का उचित मुआवजा भी प्रमुख मांगों में शामिल है। स्थायी अपशिष्ट प्रबंधन नहीं होने पर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कराई है। अब प्रभावित ग्रामीणों की नजर जांच रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर टिकी है। लोगों का कहना है कि विकास के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
मालगाड़ियां दौड़ रहीं, लेकिन यात्री ट्रेनों का इंतजार कब खत्म होगा?
दंतेवाड़ा। बैलाडीला क्षेत्र में रेल सुविधाओं को लेकर लोगों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र से प्रतिदिन बड़ी संख्या में लौह अयस्क लेकर मालगाड़ियां गुजरती हैं। लेकिन आम यात्रियों के लिए पैसेंजर ट्रेनें अक्सर दंतेवाड़ा तक ही सीमित रह जाती हैं। स्थानीय लोगों का सवाल है कि माल परिवहन निर्बाध हो सकता है तो यात्री सुविधा क्यों नहीं। पहले सुरक्षा और अब दोहरीकरण का कारण बताया जा रहा है।
लोगों का कहना है कि परिस्थितियां पहले से काफी बदल चुकी हैं। बैलाडीला रेलवे को भारी राजस्व देने वाला क्षेत्र माना जाता है। इसके बावजूद यात्री सुविधाओं के विस्तार की मांग वर्षों से लंबित है। स्थानीय नागरिक पांच से छह नियमित यात्री ट्रेनों के संचालन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि बेहतर रेल सुविधा रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान करेगी। अब क्षेत्र की जनता आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस निर्णय की प्रतीक्षा कर रही है।
सड़क नहीं संघर्ष का सफर, बारिश में जीवनरेखा बनी सबसे बड़ी चुनौती
नारायणपुर-अंतागढ़ मार्ग की बदहाल स्थिति लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ा रही है। बारिश के बीच सड़क कई जगह गड्ढों और दलदल में बदल चुकी है। इसी मार्ग से भारी खनन वाहन लगातार गुजर रहे हैं। जिससे सड़क की हालत और तेजी से खराब हो रही है। रोजाना हजारों लोगों को घंटों जाम और जोखिम भरे सफर का सामना करना पड़ रहा है। मरीज, छात्र, कर्मचारी और गर्भवती महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है।
लोगों का कहना है कि एक घंटे का सफर कई बार चार घंटे में पूरा हो रहा है। स्थानीय लोगों ने सड़क निर्माण में तेजी लाने की मांग उठाई है। निर्माण पूरा होने तक भारी वाहनों पर नियंत्रण की भी मांग की जा रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि पुराने प्रशासनिक निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा। यह सड़क पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा है, इसलिए तत्काल समाधान की मांग तेज हो गई है।
समय रहते रुके दो बाल विवाह, जागरूकता से बदली दो बेटियों की जिंदगी
बस्तर जिले में बाल विवाह रोकने की दिशा में प्रशासन को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। सूचना मिलने पर चाइल्ड हेल्पलाइन और महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम गांव पहुंची। बारिश और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अधिकारियों ने समय रहते हस्तक्षेप किया। परिवारों को बाल विवाह प्रतिषेध कानून और उसके दुष्परिणामों की जानकारी दी गई।
समझाइश के बाद दोनों परिवारों ने विवाह स्थगित करने का फैसला लिया। बालिकाओं ने भी अपनी पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई। पूरी प्रक्रिया का पंचनामा और घोषणा-पत्र मौके पर तैयार किया गया। इस कार्रवाई का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
प्रशासन का कहना है कि बाल विवाह मुक्त समाज बनाने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। जागरूकता और संवाद के जरिए सामाजिक बदलाव की यह पहल मिसाल बन रही है। यह कार्रवाई बताती है कि समय पर हस्तक्षेप से बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।
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