पटना। बिहार की राजनीति में एक बड़े युग का सूत्रपात होने जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को कैबिनेट मंत्री बनाया जा रहा है। लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद, निशांत आखिरकार सरकार का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो गए हैं। कल पटना के गांधी मैदान में आयोजित भव्य समारोह में वे मंत्री पद की शपथ लेंगे।

​मैराथन बैठकों के बाद बनी सहमति

​निशांत कुमार को राजनीति में लाने के लिए जेडीयू के शीर्ष नेताओं ने लंबी मशक्कत की है। शुरुआत में उन्होंने किसी भी पद को स्वीकार करने से मना कर दिया था, लेकिन बीती रात नीतीश कुमार के 7 सर्कुलर रोड स्थित आवास पर हुई हाई-प्रोफाइल बैठक में पासा पलट गया। ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी जैसे दिग्गजों ने उन्हें समझाया कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में उनका सरकार में शामिल होना पार्टी और राज्य के भविष्य के लिए अनिवार्य है। बैठक के बाद संजय झा और ललन सिंह खुद मंत्रियों की फाइनल लिस्ट लेकर सीएम सम्राट चौधरी से मिलने पहुंचे।

​टली ‘सद्भावना यात्रा’, अब शपथ पर नजर

​निशांत कुमार वर्तमान में बिहार में ‘सद्भावना यात्रा’ पर हैं, जिसके जरिए वे जमीनी स्तर पर जनता से फीडबैक ले रहे थे। मंत्री पद की शपथ के कारण 7 मई को प्रस्तावित उनकी यात्रा स्थगित कर दी गई है। अब वे कल शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे और 9 मई से दोबारा अपनी यात्रा पर निकलेंगे। दिलचस्प बात यह है कि निशांत उसी ‘निश्चय रथ’ का उपयोग कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल उनके पिता नीतीश कुमार अपनी यात्राओं के दौरान करते थे।

​मंत्रिमंडल का स्वरूप: 27 नए चेहरे शामिल होंगे

​कल होने वाले शपथ ग्रहण में कुल 27 मंत्रियों के शपथ लेने की संभावना है। जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधते हुए भाजपा से 12, जेडीयू से 11, लोजपा (रा) से 2, जबकि हम और रालोमो से 1-1 विधायक मंत्री बनाए जा सकते हैं। भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए 6 सीटें फिलहाल खाली रखी जा सकती हैं।

​सियासी सफर की शुरुआत

​निशांत ने इसी साल 8 मार्च 2026 को औपचारिक रूप से जेडीयू की सदस्यता ग्रहण की थी। राजनीति में आने के बाद से ही वे अपने पिता के 20 वर्षों के विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराते रहे हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी पहले ही संकेत दे दिए थे कि वे निशांत को अपनी टीम में देखना चाहते हैं। अब इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में उत्तराधिकार और नए गठबंधन के समीकरण और मजबूत होते दिख रहे हैं।