पटना। बिहार की राजनीति में पिछले कई दिनों से जारी कयासों पर अब विराम लगता नजर आ रहा है। राज्य में नई सरकार के मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार 4 मई के बाद होने की संभावना है। भाजपा के वरिष्ठ सूत्रों के अनुसार, इस देरी का मुख्य कारण पश्चिम बंगाल के चुनाव हैं, जहां बिहार भाजपा के दिग्गज सांसद, विधायक और प्रमुख पदाधिकारी चुनाव प्रचार में पूरी सक्रियता से जुटे हुए हैं। उनके वापस लौटते ही शपथ ग्रहण की प्रक्रिया शुरू होगी।

​70:30 का नया फार्मूला और जातीय समीकरण

​इस नए मंत्रिमंडल गठन में अनुभव और नए उत्साह का संतुलन बनाने के लिए ’70:30′ का फार्मूला तय किया गया है। जानकारी के मुताबिक, लगभग 70% पुराने चेहरों को दोबारा मौका दिया जाएगा, जो पूर्व में नीतीश कुमार की सरकार का हिस्सा रह चुके हैं। शेष 30% पदों पर नए नेताओं को जगह मिलेगी। इन नए मंत्रियों का चयन मुख्य रूप से क्षेत्रीय जीत के प्रभाव और राज्य के जटिल जातीय समीकरणों को साधने के आधार पर किया जाएगा, ताकि आगामी चुनावों में सामाजिक संतुलन बना रहे।

​विभागों का बंटवारा और प्रमुख जिम्मेदारियां

​पुराने मंत्रियों में से कई के विभाग बदले जा सकते हैं, जबकि अनुभवी नेताओं को स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, जल संसाधन और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान फिर से सौंपी जा सकती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का स्पष्ट कहना है कि बिहार अब ‘मोदी और नीतीश मॉडल’ के समन्वय पर आगे बढ़ेगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता संजय सरावगी के अनुसार, विभागों के अंतिम आवंटन पर मुहर एक उच्च स्तरीय बैठक में लगेगी।

​गठबंधन सहयोगियों की हिस्सेदारी

​गठबंधन धर्म को निभाते हुए जदयू के पुराने मंत्रियों को बरकरार रखने के साथ-साथ अन्य सहयोगियों को भी कैबिनेट में सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा। भाजपा कोटे से लोजपा (आर) को 2 मंत्री पद मिलने की उम्मीद है, जबकि रालोमो और ‘हम’ को 1-1 विभाग सौंपा जा सकता है।

​’दो विभाग’ नीति से बढ़ेगी कार्यक्षमता

​प्रशासनिक कार्यों में तेजी लाने और मंत्रियों पर अत्यधिक बोझ कम करने के लिए सरकार ‘अधिकतम दो विभाग’ का नियम लागू करेगी। इसके तहत भाजपा कोटे के मंत्रियों को दो से अधिक विभाग नहीं दिए जाएंगे। यह विशेष छूट भी केवल उन अनुभवी नेताओं को मिलेगी जो पूर्व में कठिन विभागों को संभालने का अनुभव रखते हैं।