चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि कन्फर्म सार्वजनिक नीलामी को बिना कारण बताए रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक शब्द अस्वीकार लिखकर नीलामी रद्द करना मनमाना फैसला है और ऐसी कार्रवाई बिना नोटिस और बिना सुनवाई के नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह का आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है और अनुच्छेद 21 में निहित न्याय के अधिकार के भी खिलाफ है। अदालत ने ऐसी प्रशासनिक कार्यप्रणाली को स्वतंत्रता पूर्व की राजशाही मानसिकता करार दिया। जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि लोकतांत्रिक भारत में कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने निजी विवेक या निरंकुश शक्तियों के आधार पर कार्य नहीं कर सकता।

हर प्रशासनिक आदेश में कारण दर्ज करना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार की अपील को खारिज कर दिया। मामला मुक्तसर के मोहल्ला वाटर वर्कर्स में स्थित 621 वर्ग गज 6 वर्ग फुट भूमि से संबंधित है। यह भूमि 6 मार्च 1987 को तहसीलदार (सेल्स), मुक्तसर द्वारा खुली सार्वजनिक नीलामी में बेची गई थी। नीलामी में राजविंदर सिंह ने 13,500 रुपए की सबसे ऊंची बोली लगाई और नियमों के अनुसार मौके पर एक चौथाई राशि जमा की। इसके बाद 9 नवंबर 1987 को सक्षम प्राधिकारी सेल्स कमिश्नर, मुक्तसर ने नीलामी को विधिवत मंजूरी दे दी। इसके बावजूद 24 मई 1988 को उसी प्राधिकारी ने बिना कोई कारण बताए, बिना नोटिस और बिना सुनवाई का अवसर दिए, केवल अस्वीकार लिखकर पहले से कंफर्म नीलामी को रद्द कर दिया।
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