रायपुर। पश्चिम बंगाल के अभेद्य माने जाने वाले सियासी किले पर आखिरकार भारतीय जनता पार्टी ने केसरिया परचम लहरा दिया है। इस ऐतिहासिक जीत के शोर के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उन ‘रणनीतिकारों’ की हो रही है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर बंगाल की जमीन पर बीजेपी की जीत की पटकथा लिखी। इस सूची में छत्तीसगढ़ के दिग्गज नेताओं के नाम सबसे ऊपर उभर कर सामने आ रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज है कि बंगाल चुनाव में पसीना बहाने वाले छत्तीसगढ़ के इन चेहरों का कद अब राष्ट्रीय संगठन में बढ़ना तय है।

पवन साय: छत्तीसगढ़ के संगठन मंत्री पवन साय करीब आठ महीने पहले ही बंगाल कूच कर गए थे। उन्हें 60 से अधिक विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जहां उन्होंने संगठन को निचले स्तर तक मजबूत किया।
विजय शर्मा: छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा की कार्यक्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार राज्यसभा चुनाव में मिली शत-प्रतिशत सफलता के बाद, अमित शाह के 15 दिवसीय बंगाल प्रवास के दौरान उनकी ‘स्पेशल ड्यूटी’ लगाई गई थी। उनके साथ बस्तर के कद्दावर आदिवासी नेता महेश गागड़ा ने भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सौरभ सिंह: कलकत्ता को अपना मुख्यालय बनाकर सौरभ सिंह ने शहर और आसपास की 52 से अधिक सीटों पर कमान संभाली। नतीजों के दौरान भी वे मोर्चे पर डटे रहे।
अनुराग सिंहदेव: छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव ने भी बंगाल की 6 संवेदनशील सीटों पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और रणनीति तैयार करने में अहम योगदान दिया।
महेश गागड़ा: बस्तर क्षेत्र के आदिवासी नेता महेश गागड़ा की भी सक्रिय भागीदारी की चर्चा है, जिन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय बनाए रखा।
जीत के वो तीन ‘X-फैक्टर्स’ जिन्होंने पलट दी बाजी
बंगाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे तीन प्रमुख कारण माने जा रहे हैं, जिसमें प्रशासनिक चातुर्य और लोकलुभावन घोषणाओं का मिश्रण दिखा:
वोटर लिस्ट का ‘शुद्धिकरण’
निर्वाचन आयोग के अभियान के चलते बंगाल में लगभग 11.8 प्रतिशत मतदाता (करीब 91 लाख नाम) वोट देने से वंचित रह गए। टीएमसी ने इसे बीजेपी की साजिश बताया, लेकिन बीजेपी ने इसे “अवैध घुसपैठियों और ब्लैक वोट्स के खिलाफ शुद्धिकरण” करार देकर ध्रुवीकरण को हवा दी। खासकर मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे टीएमसी के गढ़ों में इसका व्यापक असर दिखा।
छत्तीसगढ़ मॉडल का जादू
बीजेपी ने बंगाल की महिलाओं के लिए 3000 रुपये प्रति माह देने का वादा किया। छत्तीसगढ़ की तर्ज पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए, जिसने ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मीर भंडार’ (1500 रुपये) योजना के प्रभाव को कम कर दिया।
वर्तमान परिस्थितियों में पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों को लेकर अंतिम निष्कर्ष आना अभी बाकी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस पूरे अभियान में भाजपा ने व्यापक संगठनात्मक प्रयोग किया है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के नेताओं की भूमिका को पार्टी के भीतर भविष्य की रणनीति और राष्ट्रीय टीम गठन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में नतीजों की पूर्ण तस्वीर स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो पाएगा कि इन रणनीतिक प्रयोगों का वास्तविक प्रभाव कितना रहा।
नितिन नबीन की नई टीम में शामिल हो सकते हैं ये नाम
चर्चा है कि छत्तीसगढ़ के संगठन प्रभारी पवन साय, विजय शर्मा, सौरभ सिंह, महेश गागड़ा और अनुराग सिंहदेव को नितिन नबीन की राष्ट्रीय टीम में अहम जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।
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