दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने मैटरनिटी लीव (maternity leave) को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश से वापस लौटने वाली महिला कर्मचारी को उसी पद पर काम करने का अधिकार है, जिस पर वह छुट्टी पर जाने से पहले कार्यरत थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व को कार्यस्थल पर किसी महिला के लिए अपमान या नुकसान का कारण नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने कहा कि अगर मैटरनिटी लीव से लौटने तक महिला की पहले वाली पोस्ट उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता को उसे समान वेतन, ग्रेड, स्टेटस, जिम्मेदारियों, अधिकारों और करियर की संभावनाओं वाली दूसरी पोस्ट देनी होगी।

वैकल्पिक पोस्ट की पूरी जानकारी देना जरूरी

कोर्ट ने कहा कि अगर महिला के लौटने से पहले उसकी पुरानी पोस्ट उपलब्ध नहीं है, तो एम्प्लॉयर को इसकी वजह के बारे में उसे पहले से जानकारी देनी चाहिए। साथ ही, उसे दी जाने वाली वैकल्पिक पोस्ट की पूरी जानकारी भी बतानी होगी। इसमें ग्रेड, सैलरी, रिपोर्टिंग स्ट्रक्चर और जिम्मेदारियों का स्पष्ट विवरण शामिल होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सामान्य स्थिति में मैटरनिटी लीव से लौटने वाली महिला कर्मचारी को उसी पद पर वापस आने का अधिकार है, जिस पर वह छुट्टी पर जाने से ठीक पहले काम कर रही थी।

6 महीने के भीतर नियम बनाए केंद्र

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत जरूरी नियम बनाने का निर्देश भी दिया है। कोर्ट ने कहा कि इन नियमों में मैटरनिटी लीव के बाद महिला कर्मचारियों की नौकरी पर वापसी से जुड़े प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए। अदालत ने नियमों में ब्रेस्टफीडिंग के लिए जरूरी सहायता, क्रेच यानी बच्चों की देखभाल की सुविधा की जानकारी और शिकायतों के निपटारे की समय-सीमा जैसे पहलुओं को शामिल करने की बात कही है। कोर्ट ने कहा कि नियम तैयार करते समय केंद्र सरकार अपने स्टैंडिंग काउंसिल आशीष दीक्षित की ओर से दिए गए सुझावों पर भी विचार करेगी।

उसी पद पर वापस बहाल करने की मांग

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला एक महिला की याचिका पर आया, जिसे वर्ष 2022 में एक निजी कंपनी में चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था। याचिका के मुताबिक, मई 2023 में उसने कंपनी के मैनेजमेंट को अपनी प्रेग्नेंसी की जानकारी दी थी। इसके कुछ महीने बाद सितंबर में उसका ट्रांसफर दूसरी टीम में कर दिया गया। महिला का कहना था कि मैटरनिटी लीव से लौटने के बाद उसे बताया गया कि उसकी पुरानी टीम में कोई पद खाली नहीं है। इसके बाद उसे ट्रेजरी डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि नई भूमिका उसकी पहले वाली जिम्मेदारियों और पद से संबंधित नहीं थी। इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया और मांग की कि उसे उसी पद पर वापस बहाल किया जाए, जिस पर उसके पुरुष सहकर्मियों को बाद में सीनियर मैनेजर के पद पर प्रमोशन मिला था। याचिका में महिला ने कथित मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न के लिए 50 लाख रुपये के मुआवजे की भी मांग की। साथ ही, केंद्र सरकार से निजी कंपनियों में प्रेग्नेंसी के आधार पर होने वाले कथित भेदभाव को रोकने के लिए कड़े नियम बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

कंपनी ने याचिका का क्यों किया विरोध?

महिला की याचिका का विरोध करते हुए कंपनी ने कहा कि यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि वह एक निजी संस्था है और कोई सार्वजनिक कार्य नहीं करती। कंपनी के मुताबिक, याचिकाकर्ता व्यक्तिगत सेवा से जुड़े ऐसे अनुबंध को लागू करवाने की मांग कर रही हैं, जिसे कानूनन लागू नहीं कराया जा सकता। कंपनी ने यह भी कहा कि महिला के पास वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद हैं और इस संबंध में उसने ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020’ का हवाला दिया। कंपनी ने किसी भी तरह के डिमोशन या पदावनति के आरोप से भी इनकार किया। उसका कहना था कि महिला की सैलरी, पद और सालाना इंक्रीमेंट में कोई बदलाव नहीं किया गया था। कंपनी ने इसी आधार पर याचिका में लगाए गए दावों का विरोध किया।

‘संवैधानिक सुरक्षा की मूल भावना के खिलाफ’

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने 88 पन्नों के फैसले में कंपनी को महिला को मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 1.5 लाख रुपये देने का आदेश दिया। यह रकम आठ हफ्ते के भीतर चुकानी होगी। हालांकि, कोर्ट ने महिला को दोबारा नौकरी पर रखने का निर्देश नहीं दिया, क्योंकि वह पहले ही कंपनी से इस्तीफा दे चुकी थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी महिला को उसके मातृत्व संबंधी अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए दंडित करना या उसे मां बनने और अपने करियर में आगे बढ़ने के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना, संविधान के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की मूल भावना के खिलाफ है।

मां बनना नुकसान का आधार नहीं बनाया जा सकता

कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर मां बनना असमान व्यवहार या पेशेवर नुकसान का आधार नहीं हो सकता। अगर किसी महिला कर्मचारी को सिर्फ प्रेग्नेंसी या मैटरनिटी लीव लेने के कारण नुकसान उठाना पड़ता है, उसकी प्रोफेशनल ग्रोथ रोकी जाती है, प्रमोशन से वंचित किया जाता है या उसकी जिम्मेदारियां कम कर दी जाती हैं, तो यह स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसा व्यवहार न सिर्फ मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह मनमाना भी है और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

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